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युवाओं में बढ़ रहा कम उम्र में जुए की लत का खतरा, विज्ञापनों पर सख्ती और जागरूकता जरूरी: अध्ययन

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विशेषज्ञों की चेतावनी—ऑनलाइन सट्टेबाजी और पोकर मशीनें युवाओं को तेजी से बना रही हैं लती, परिवार और सरकार दोनों की भूमिका अहम।

मेलबर्न। स्मार्टफोन और ऑनलाइन सट्टेबाजी के बढ़ते चलन के साथ युवाओं में कम उम्र में जुए की लत का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर केवल युवाओं की आर्थिक स्थिति ही नहीं, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक जीवन और सामाजिक संबंधों पर भी गंभीर रूप से पड़ सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार को जुए के विज्ञापनों और उद्योग पर सख्त नियमन लागू करना होगा, वहीं परिवारों को भी बच्चों को इसके दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक बनाना होगा।

चार्ल्स लिविंगस्टोन (मोनाश यूनिवर्सिटी) द्वारा प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया में आठ प्रतिशत से अधिक वयस्क किसी न किसी रूप में जुए के दुष्प्रभावों से प्रभावित हैं, जबकि लगभग एक प्रतिशत लोग अत्यधिक जोखिम वाले स्तर पर जुआ खेलते हैं। सबसे अधिक खतरा 18 से 34 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में देखा गया है।

अध्ययन में बताया गया है कि नियमित रूप से पोकर मशीन (पोकी) और ऑनलाइन सट्टेबाजी करने वाले इस आयु वर्ग के करीब 90 प्रतिशत लोगों को आर्थिक नुकसान, रिश्तों में तनाव और अन्य गंभीर सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार, जुए के ये स्वरूप सबसे अधिक लत लगाने वाले और नुकसानदेह हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर

शोध में कहा गया है कि जुए की लत केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहती। इससे व्यक्ति में अपराधबोध, शर्म, पछतावा, तनाव, अवसाद और चिंता जैसी मानसिक समस्याएं बढ़ सकती हैं। कुछ मामलों में यह आत्महत्या के जोखिम को भी बढ़ा देती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जुए का प्रभाव केवल जुआ खेलने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इसका असर उसके परिवार, जीवनसाथी, बच्चों, मित्रों और कार्यस्थल तक पड़ता है। माता-पिता में जुए की लत पारिवारिक हिंसा, वैवाहिक विवाद, बच्चों की उपेक्षा और दुर्व्यवहार जैसी समस्याओं से भी जुड़ी पाई गई है।

कम उम्र में शुरुआत, अधिक खतरा

अध्ययन के अनुसार, बचपन या किशोरावस्था में जुए के संपर्क में आने वाले लोगों में वयस्क होने पर गंभीर जुआ संबंधी समस्याओं का जोखिम काफी बढ़ जाता है। जितनी कम उम्र में कोई व्यक्ति जुआ खेलना शुरू करता है, उसके लती बनने की संभावना उतनी अधिक होती है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि किशोरावस्था में मस्तिष्क का विकास जारी रहता है और इस दौरान जोखिम लेने की प्रवृत्ति अधिक होती है। छोटे-छोटे पुरस्कार मिलने पर मस्तिष्क में डोपामिन का स्राव बढ़ जाता है, जिससे जुए की आदत तेजी से विकसित हो सकती है।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और विज्ञापन बढ़ा रहे खतरा

अध्ययन में कहा गया है कि स्मार्टफोन और ऑनलाइन सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म ने जुए को पहले से कहीं अधिक सुलभ बना दिया है। अब युवा बिना किसी कैसीनो या जुआ केंद्र में जाए और कई बार परिवार की जानकारी के बिना भी ऑनलाइन जुआ खेल सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि ऑनलाइन सट्टेबाजी कंपनियां उपयोगकर्ताओं की गतिविधियों का डेटा एकत्र कर उनकी रुचियों का प्रोफाइल तैयार करती हैं और उसी आधार पर लक्षित विज्ञापन दिखाती हैं। टीवी और खेल प्रतियोगिताओं के दौरान प्रसारित होने वाले जुए के विज्ञापन भी युवाओं और बच्चों को प्रभावित करते हैं।

विशेषज्ञों की सलाह

विशेषज्ञों का कहना है कि जुए की लत का उपचार संभव है। कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (सीबीटी) जैसी उपचार पद्धतियां लोगों की सोच और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने में मदद करती हैं। हालांकि, सामाजिक कलंक और शर्म के कारण अधिकांश लोग समय पर इलाज नहीं कराते।

उन्होंने सरकार से जुए के विज्ञापनों पर कड़े प्रतिबंध लगाने और उद्योग के नियमन को मजबूत करने की मांग की है। उनका मानना है कि मौजूदा नियम बच्चों और युवाओं को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं।

माता-पिता क्या कर सकते हैं?

विशेषज्ञों ने परिवारों के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए हैं—

  • बच्चों से C और फिटनेस के नजरिए से देखने की बात करें, जुए को खेल का हिस्सा न बताएं।
  • रात 8:30 बजे के बाद खेल प्रसारण देखने से बचें, क्योंकि इस समय के बाद जुए के विज्ञापन प्रसारित हो सकते हैं।
  • बच्चों के मोबाइल, टैबलेट और अन्य डिजिटल उपकरणों में ऐसे सुरक्षा टूल्स का इस्तेमाल करें, जो ऑनलाइन जुआ वेबसाइटों और भुगतान विकल्पों तक पहुंच को प्रतिबंधित करते हों।

विशेषज्ञों का मानना है कि जुए की बढ़ती लत केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक चिंता का विषय बन चुकी है। युवाओं को इस खतरे से बचाने के लिए सरकार, परिवार, स्कूल और समाज को मिलकर जागरूकता बढ़ाने, विज्ञापनों पर नियंत्रण लगाने और समय पर उपचार उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।

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