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‘अपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति नहीं लड़ सकता चुनाव’

supreme court of india2नयी दिल्ली। पंचायत चुनाव के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए बड़ा फरमान जारी किया है। कोर्ट ने कहा ‌है कि कोई भी व्यक्ति अपराधिक मामले में आरोप तय होने पर चुनाव नहीं लड़ सकेगा।

कोर्ट ने ये भी कहा कि इस बात में कोई गलती नजर नहीं आती। इससे चुनाव प्रक्रिया में शुद्धता आएगी। कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर व्यक्ति अपर‌ाधिक मामले में बरी हो जाता है तो वह चुनाव लड़ सकता है और अगर उसे सजा होती है तो वह 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ पाएगा।

कोर्ट में याचिकाकर्ता ने किसानों की आत्महत्या को लेकर सवाल किया और कहा कि इस साल किसानों की फसलें खराब हुई हैं। वे कर्ज के बोझ तले दबे हैं। इसका जवाब देते हुए कोर्ट ने कहा कि सरकार किसानों को पूरी राहत नहीं दे सकती, लेकिन कुछ शर्तों के साथ सहयोग किया जा सकता है।

8वीं और 10वीं पास लोग ही पंचायत चुनाव लड़ पाएंगे या सभी। इस सवाल का जवाब आज मिल जाएगा। सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई है। हरियाणा पंचायत चुनाव में शिक्षित प्रत्याशी सहित लगाई गई विभिन्न शर्तों को चुनौती देने वाली दोनों महिलाओं राजबाला और कमलेश को उम्मीद है कि अदालत का फैसला उनके पक्ष में आएगा। आज उनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है। माना जा रहा है कि सर्वोच्च अदालत इस पर फैसला सुना सकती है।

इस मामले में पिछली सुनवाई पर अदालत ने हरियाणा सरकार से साफ कह दिया था कि या तो शर्त को वापस ले या फैसला आने तक चुनाव रोक दे। प्रदेश सरकार को इस पर चुनाव स्थगित करना ही उचित लगा और राज्य में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव उस समय स्थगित हो गए, जब पहले दौर के लिए नामांकन पत्र दाखिल किए जा चुके थे।

panchayat-electionराजबाला और कमलेश की ओर से बातचीत करते हुए प्रीत सिंह ने कहा कि उन्होंने याचिका में प्रत्याशियों की पढ़ाई की शर्त के अलावा सभी शर्तें हटाने की मांग की है। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने अपनी बात रखते हुए यही दलील दी है कि चुनाव आयोग का काम चुनाव कराना है और बिजली के बिल वसूलना बिजली विभाग का व लोन की रकम वसूलना संबंधित बैंकों का काम है। चुनाव आयोग सारी जिम्मेदारी कैसे ले सकता है? उन्होंने कोर्ट से यह भी कहा कि बिजली बिल भरना सबकी जिम्मेदारी है, लेकिन इसके बिना चुनाव लड़ने पर रोक लगाना गलत है।

याचिका में प्रदेश के किसानों पर प्राकृतिक आपदा का हवाला देते हुए कहा गया कि प्रदेश के किसान इस समय 5 रुपये सैकड़ा ब्याज पर साहूकारों से लोन लेकर बैंकों का कर्ज उतार रहे हैं, जिससे वे कर्ज के चक्र में घिरते जा रहे हैं और यह स्थिति किसानों की आत्महत्याओं को बढ़ावा देती है।

शौचालय की शर्त पर भी कोर्ट के समक्ष याचियों ने दलील रखी है कि गांवों में कई लोगों के पास 10 गुना 10 फुट के छोटे-छोटे घर हैं, जिसमें माता-पिता, बेटा-बहू और पशु भी रखे जाते हैं। ऐसे में शौचालय कैसे बनवाए जाएं?

उन्होंने उम्मीद जताई कि अदालत ग्रामीणों की हालत को भली भांति समझती है, इसलिए चुनाव के लिए प्रत्याशियों पर लगाई गए शर्तें अदालत द्वारा हटा ली जाएंगी।

पंचायत चुनाव लड़ने के लिए शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करने के अपने फैसले को हरियाणा सरकार ने जायज ठहराया है। राज्य सरकार का कहना है कि इस निर्णय को गलत कैसे कहा जा सकता है कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले इस निर्णय पर मुहर लगा चुका है कि सरपंच और उप सरपंच वही बन सकता है, जिनके दो से अधिक बच्चे न हों।

सरकार का तर्क है कि चुनाव लड़ना न तो मूल अधिकार है और न ही कॉमन लॉ है। यह वैधानिक अधिकार है। ऐसे में राज्य सरकार कानून बनाकर योग्यता निर्धारित कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में बुधवार को सुनवाई करेगा। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में सरकार ने कहा है कि 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने जावेद बनाम हरियाणा मामले में हरियाणा निगम (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1994 को सही ठहराया था।

इस अधिनियम के तहत हरियाणा सरकार ने दो से अधिक बच्चों के माता-पिता को ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद का चुनाव लड़ने पर अयोग्य ठहराया था। राज्य सरकार का कहना है सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम को गांवों में सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के लिए सकारात्मक कदम बताते हुए कहा था कि नियम बनाना राज्य सरकार का विवेक है। इस नियम को सुप्रीम कोर्ट ने जनहित में बताया था।

हरियाणा सरकार ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2003 में दिए आदेश को ध्यान में रखते हुए ही नया कानून बनाया गया है। न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर की दो सदस्यीय पीठ वर्ष 2003 में तीन सदस्यीय पीठ के आदेश के खिलाफ नहीं जा सकती।

भले ही सांसदों और विधायकों के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नहीं है, लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि सरकार पंचायत चुनाव के लिए यह अनिवार्यता तय नहीं कर सकती। सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट अपने पूर्व के आदेश को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

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