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मस्जिदें में सिर्फ इबादत की इजाजत, पढ़ाई के लिए जाना होगा विद्यालय, फ्रांस में विवादित विधेयक पेश

पेरिस। हाल के दिनों में इस्लामिक कट्टरपंथियों की वजह से कई बार लहूलुहान हो चुके फ्रांस की संसद में एक विवादित विधेयक (Supporting Republican Principles) पेश किया गया है। इसके कानून बनने पर मस्जिद को सिर्फ धर्मस्थल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा। यानी यहां धर्मिक शिक्षा का केंद्र (मदरसा) संचालित नहीं किया जा सकेगा। कहा जा रहा है कि ऐसा कानून लाकर इस्लामिक कट्टरवाद  से लड़ने की तैयारी की जा रही है जिसे लेकर राष्ट्रपति इम्मैन्युअल मैक्रों मुस्लिम आबादी और इस्लामिक देशों के निशाने पर रहे हैं।

हालांकि इस विधेयक में सीधे तौर पर इस्लाम या मुस्लिमों का जिक्र नहीं किया गया है लेकिन माना जा रहा है कि आने वाले महीनों में जब यह संसद में पेश होगा तब इस पर तीखी बहस होगी।

विधेयक के अनुसार, मस्जिदों को पूजास्थल के तौर पर रजिस्टर किया जाएगा ताकि उनको बेहतर तरीके से पहचाना जा सके। किसी जज को आतंकवाद, भेदभाव, नफरत या हिंसा के दोषी को मस्जिद जाने से रोकने का भी अधिकार होगा। 10 हजार यूरो से ज्यादा विदेशी फंडिंग होने पर उसकी घोषणा भी करनी होगी। एक से ज्यादा शादी करने वालों को रेजिडेंस कार्ड भी नहीं दिए जाएंगे।

इस नए विधेयक के तहत महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग स्विमिंग पूल्स को खत्म कर दिया जाएगा और तीन साल की उम्र से ही बच्चों को स्कूल भेजना अनिवार्य होगा।

होम-स्कूलिंग की इजाजत नही

प्रस्तावित कानून के जरिए घर पर पढ़ाई करने (home schooling), मस्जिदों और ऐसे संगठनों पर नियम लागू किए गए हैं जो फ्रांस के मूल्यों के खिलाफ किसी विचारधारा को बढ़ावा देने वाले हों। इसके तहत तीन साल की उम्र के बाद बच्चों की होम-स्कूलिंग की इजाजत सिर्फ खास परिस्थितियों में दी जाएगी। इसके तहत अवैध स्कूलों पर नकेल कसने की बात की जा रही है जहां किसी खास एजेंडे के तहत पढ़ाई कराई जाती है।

आंतरिक मामलों के मंत्री जेराल्ड डरमेनिन का कहना है कि मैक्रों ने उनसे ईसाई-विरोधी, यहूदी-विरोधी और मुस्लिम-विरोधी कानूनों से लड़ने के लिए संसदीय मिशन तैयार करने के लिए कहा है।  प्रधानमंत्री जीन कास्टेक्स ने इस बात पर जोर दिया है कि विधेयक मुस्लिम या किसी और धर्म के खिलाफ नहीं है। उन्होंने बताया है कि विधेयक में देश के 1905 के कानून में बदलाव भी प्रस्तावित किए गए हैं जिनमें चर्च को सरकार से अलग करते हुए धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र सुनिश्चित किया गया है। उन्होंने कहा कि मूल्यों, परंपराओं और खतरों में बदलाव के कारण धर्मनिरपेक्षता कानून और 1901 के उस कानून में बदलाव की जरूरत है जिसके नियम एसोसिएशन पर लागू होते हैं।

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