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नेत्ररोग विशेषज्ञ डॉ. भ्रमरेश के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में मुकदमा, 10 साल की बेटी के पिता ने दर्ज कराया वाद

नेत्ररोग विशेषज्ञ डॉ. भ्रमरेश के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में मुकदमा

बरेली। शहर के प्रसिद्ध नेत्र चिकित्सक डाँक्टर भ्रमरेश चन्द्र शर्मा के विरुद्ध एक 10 वर्षीय बेटी के पिता ने उपभोक्ता फोरम में मुकदमा दर्ज कराया है। आरोप है कि डॉक्टर द्वारा दी गयी दवाओं से बच्ची की आंख में मोतियाबिन्द बन गया। अब दिल्ली के एम्स में उसका इलाज चल रहा है।

यह है मामला –

मुकदमा दर्ज कराने वाले एडवोकेट यशपाल सिंह ने बताया कि उनकी एक 10 साल की बिटिया है। उसकी आँखों के आस पास कभी-कभी खुजली होती थी और वह लाल हो जाती थीं। इसी के लिए इलाज के लिए वह डॉक्टर भ्रमरेश से मिले और बिटिया को दिखाया।

इस पर डॉ. भ्रमरेश ने दोंनों आँखों में एलर्जी बताते हुए इलाज के लिए स्टेरॉयड्स युक्त दवाएं लगातार डेढ़ साल डालने के लिए लगातर परामर्श देते रहे। इससे बिटिया की एलर्जी तो ठीक नहीं हुई उल्टे दोनों आंखो में मोतियाबिंद हो गया।

यशपाल सिंह ने बताया कि ये मोतियाबिंद का होना भी तब पता चला जब बिटिया को दिखने में बहुत दिक्कत होने लगी। आंखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा, जबकि डॉक्टर साहब कें पास हम बिटिया को लगभग हर एक-दो माह में परीक्षण व परामर्श कें लिए लगातर जाते रहे। खुद अंतिम परामर्श तिथि (सितम्बर 2016)पर जब मैंने इन डॉक्टर साहब को दिखने में समस्या आने सम्बन्धी बात बताई तो इन्होने खुद उसको मोतियाबिंद होने की पुष्टि की।

अन्य डॉक्टर्स बोले- दवा का ही दुष्प्रभाव

यह पूछने पर कि इस छोटी सी बच्ची को मोतियाबिन्द कहीं आपके परामर्श की किसी दवा कें दुष्प्रभाव से तो नहीं हुआ है? उन्होंने साफ इनकार कर दिया। साथ ही सस्ते में ऑपरेशन तथा मेडिक्लेम आदि की जुगाड़ करने की बात कही। इसके बाद बरेली, लखनऊ और दिल्ली के विभिन्न डॉक्टर्स से परामर्श किया तो सभी ने इसे दवा का ही दुष्प्रभाव बताया। दिल्ली एम्स ने भी दवा को चिन्हित कर उसका ही दुष्प्रभाव बताया ।

साथ ही सब जगह दोनों आँखों का इलाज ऑपरेशन ही बताया और उस दवा को भी चिन्हित किया जिससे अब ऑपरेशन की नौबत आ गई। यशपाल ने बताया कि अंत में एम्स दिल्ली में उसका ऑपरेशन दिसम्बर 2016 में किसी तरह कराया गया।

बताया कि उसकी दोंनो आँखों का अब ऑपरेशन करके प्राकृतिक लेंस निकाला जा चुका है और आर्टिफिशियल लेंस लगाया गया है। चश्मा आजीवन प्रयोग किया जाना मजबूरी बन गयी है। अभी भी लगभग हर दो माह में एक बार दिल्ली एम्स में फॉलोअप एवं चिकित्सा हेतु जाना पड़ रहा है।

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