बरेली@BareillyLive: भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष राजेश अग्रवाल ने इत्तेहाद-ए-मिल्लत के अध्यक्ष मौलाना तौकीर को लेकर बड़ा बयान जारी किया है। उन्होंने कहा है कि 2010 के दंगों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। मौलाना तौकीर तो केवल इन दंगों का एक चेहरा थे। दंगे के असली चेहरों पर से भी नकाब हटना ही चाहिए।
राजेश अग्रवाल ने बयान जारी कर कहा कि 1982 से बरेली की राजनीति में एक नया अध्याय तब जुड़ा, जब मौलाना तौकीर अहमद ने राजनीतिक पटल पर सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। यह वही परिवार था, जिसे वर्षों तक समाज में एक पवित्र, धार्मिक और सम्मानित परिवार के रूप में जाना जाता रहा। उनके बड़े बाबा साहब का बरेलवी मसलक पूरे विश्व में प्रसिद्ध है, इनकी प्रतिष्ठा भारत सरकार ने स्वीकार की, डाक टिकट जारी किए। बड़े मियाँ ख़ुद बहुत विद्वान थे उन्होंने धर्म और चिंतक पर पुस्तके लिखी, स्कॉलर्स ने उन पर पीएचडी भी की। सरकार और समाज में वे विशेष सम्मान का प्रतीक माने जाते थे।
राजनीति ने बदला चरित्र, लोगों को भड़काने लगे तौकीर
राजनीति ने धीरे-धीरे इस परिवार के चरित्र को बदला, कांग्रेस ने इनके वालिद साहब को एमएलसी बनाकर राजनीति में प्रवेश दिया। इसके बाद धर्म की आड़ में मौलाना तौकीर ने धर्म के आधार पर समाज को बांटने की राजनीति की। मौलाना तौकीर स्वयं को मुसलमानों का मसीहा बताकर धर्म के नाम पर भीड़ को भड़काने का कार्य करने लगे।
2010ः बरेली को जलाने की साज़िश और समाज की एकजुटता
साल 2010 में बरेली को दंगों की आग में झोंकने की एक सुनियोजित साज़िश की गई। कर्फ्यू के दौरान इस्लामिया इंटर कॉलेज में 20-25 हज़ार और आज़ाद इंटर कॉलेज में 10-12 हज़ार लोगों की भीड़ इकट्ठा की गई थी। योजना थी कृ “आधी बरेली को रातों-रात फूंक देना।”
स्थिति भयावह थी- प्रशासनिक अधिकारियों ने टेलीफोन तक बंद कर लिये थे। शहर में भय का वातावरण था।
लेकिन मां काली की कृपा और समाज की सजगता से परिस्थिति बदली। क्षेत्र के लोधी समाज के युवाओं और महिलाओं ने आह्वान पर एकजुट होकर बिना किसी हथियार के बेलन, चकला और जो कुछ भी उपलब्ध था, लेकर मोर्चा संभाला। मात्र आधे घंटे में 35दृ40 हज़ार लोग, जिनमें 5दृ7 हज़ार महिलाएं शामिल थीं, एकत्रित हो गए। उनकी इस एकजुटता के सामने उपद्रवियों को पीछे हटना पड़ा और तभी प्रशासन भी सक्रिय हुआ।
न्यायिक आदेश और राजनीतिक दबाव
घटना के बाद उच्च न्यायालय ने 28 जुलाई 2010 को स्पष्ट आदेश जारी किया कि संबंधित पक्ष किसी भी असामाजिक या राष्ट्रविरोधी गतिविधि में शामिल न हों। लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण मामला वर्षों तक दबा रहा। बरेली के तत्कालीन माननीय एडीजे ने स्वतः संज्ञान लेकर एफआईआर दर्ज करवाई और तौकीर विरुद्ध वाद आरम्भ हुआ, राजनीति सक्रिय हुई, वाद को अन्यत्र स्थानांतरित किया गया, और माननीय न्यायधीश का तबादला चित्रकूट कर दिया गया।
“तौकीर केवल एक चेहरा थे, असली चेहरे अब बेनकाब होने चाहिए”
अभी तक की प्रदेश सरकार द्वारा की गई कार्यवाही से ज्ञात होता है कि इस कांड के तार प्रदेश से तो जुड़े ही थे बल्कि देश और विदेश से भी जुड़े होने की प्रबल संभावना प्रतीत होती है। अतः प्रदेश सरकार इसकी गहनता से जाँच करवा भी रही है, आवश्यकता पड़ने पर केंद्रीय एजेंसियों का भी सहयोग लिया जाए तो निश्चित रूप से दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा और वे चेहरे जो राजनीतिक और व्यतिगत रोटियाँ सेक रहे थे, उजागर होंगे।
समाज की एकजुटता ही हमारी असली ताकत है
2010 की घटनाएँ केवल अतीत की कहानी नहीं हैं कृ वे इस बात का प्रमाण हैं कि जब समाज एकजुट होता है तो सबसे बड़ी साज़िशें भी विफल हो जाती हैं। आज आवश्यकता है सच्चाई को सामने लाने की, न्याय को सुनिश्चित करने की और सामाजिक सौहार्द की रक्षा करने की।
मां काली की कृपा और जनता की सजगता ने उस समय बरेली को बचाया था, और आज भी वही एकजुटता हमारा सबसे बड़ा बल है।





