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महाभारत सर्किट बनाकर संजोये जा सकते हैं पाण्डवों की मौजूदगी के ये निशान

लीलौर झील, थीम पार्क, राजा द्रुपद का किला, भीमगदाशरद सक्सेना, आँवला(बरेली)। प्राचीन भारतीय सभ्यता का प्रतीक महाभारत कालीन अहिच्छत्र क्षेत्र को महाभारत सर्किट बनाकर संरक्षित करने की जरूरत है। यह सुझाव वरिष्ठ समाजसेवी जे.सी. पालीवाल ने मंगलवार को पांडवकालीन रामनगर अहिच्छत्र के प्राचीन स्थलों लीलौर झील, थीम पार्क, राजा द्रुपद का किला, भीमगदा के भ्रमण के बाद कही।

श्री पालीवाल ने रामनगर में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि उचित देखरेख न हो सकने तथा सरकार की उपेक्षा के चलते इस ऐतिहासिक स्थल का जो विकास होना चाहिए वह नहीं हो पा रहा है। इस क्षेत्र का विकास होने व इसे पर्यटन के रूप मं विकसित किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि काफी प्रयासों के बाद इस क्षेत्र में भारत सरकार के द्वारा थीम पार्क बनवाया गया, रखरखाव के अभाव में इसकी स्थिति भी दिनो दिन खराब होती जा रही है।

यहीं पर हुआ था द्रौपदी का स्वयंवर

उन्होंने बताया कि सरकार द्वारा लीलौर झील के लिए 7 करोड की धनराशि स्वीकृत की गई थी जिससे लीलौर झील का विकास कर इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना था। जिले के अधिकारियें ने इस क्षेत्र का भ्रमण भी किए, कुछ दिनों तक यहां कुछ कार्य भी हुआ परन्तु पिछले काफी समय से यहां पर विकास कार्य ठप पडे़ हैं। उन्होंने कहा कि महाभारत सर्किट के रूप में कुरूक्षेत्र, मथुरा, वृंदावन लीलौर झील को पर्यटन के रूप में विकसित किया जाए। बताया कि यहीं पर द्रौपदी का स्वयंवर हुआ था तथा पांडवों द्वारा यहां पर अपना अज्ञातवास का समय व्यतीत किया गया था। इसी लीलौर झील पर अज्ञातवास के दौरान पांडवें से यक्ष प्रश्न किए गए थे।

उनके साथ वीरेन्द्र स्वरूप सक्सेना, मो0 नवी, राजीव रंजन, आनन्द स्वरूप सरन, विनय चतुर्वेदी, रंजीत बालिया, राजेन्द्र गंगवार, इतिहास कार गिरिराज नंन्दन गुप्ता आदि मौजूद रहे।

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