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विकास दुबे एनकाउंटर: सुप्रीम कोर्ट ने जांच कमेटी में सेवानिवृत्त जज व पूर्व डीजीपी को भी किया शामिल

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बहुचर्चित विकास दुबे एनकाउंटर मामले में और कानपुर के बिकरू गांव में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित कमेटी का पुनर्गठन किया है। शीर्ष अदालत ने कमेटी में उत्तर प्रदेश सरकार के प्रस्तावित नामों को मंजूरी देते हुए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश बीएस चौहान और पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता को शामिल किया है। सेवानिवृत्त न्यायाधीश बीएस चौहान को जांच समिति का प्रमुख बनाया गया है।

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने निर्देश दिया कि जांच कमेटी एक सप्ताह के भीतर काम करना शुरू कर दे और जांच को दो महीने के भीतर समाप्त कर लिया जाए।

न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और वी. रामसुब्रमण्यम की पीठ ने भी अधिसूचना को मंजूरी दे दी और उत्तर प्रदेश सरकार को इसे अधिसूचित करने को कहा। शीर्ष अदालत ने केंद्र को जांच समिति को सचिवीय सहायता प्रदान करने का निर्देश दिया और कहा कि समिति को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) या किसी अन्य केंद्रीय एजेंसी द्वारा सहायता प्रदान की जानी चाहिए।

पीठ ने कहा कि जांच कमेटी कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट के तहत अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ राज्य सरकार को भी सौंपेगी। शीर्ष अदालत ने कहा कि जांच कमेटी द्वारा की जाने वाली जांच का दायरा पर्याप्त होना चाहिए।

पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत जांच कमेटी के हाथों को बांधने के पक्ष में नहीं है और इसके लिए संदर्भ अवधि रखना बुद्धिमानी नहीं होगी। इसमें कहा गया है कि कमेटी को आठ पुलिसकर्मियों की हत्या और उसके बाद हुई मुठभेड़ों में विकास दुबे और उसके कथित सहयोगियों के मारे जाने की घटनाओं की जांच करनी होगी।

उत्तर प्रदेश की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को सूचित किया कि न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) चौहान ने जांच कमेटी का हिस्सा बनने के लिए अपनी सहमति दे दी है। मेहता ने कहा कि पैनल उन परिस्थितियों की भी जांच करेगा जिनके तहत गैंगस्टर विकास दुबे को जमानत पर रिहा किया गया था जबकि उसके ऊपर 65 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज थे। 

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल हुईं, जिनमें विकास दुबे और उसके साथियों के मुठभेड़ में मारे जाने की घटनाओं पर सवाल उठाए गए हैं। साथ ही मुठभेड़ कांड की जांच सीबीआई, एनआईए या कोर्ट की निगरानी में एसआईटी से कराए जाने की मांग की गई है।

 

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