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शांति शरण विद्यार्थी : यूनियन जैक उतार कर फहरा दिया था तिरंगा

75वें स्वतंत्रता दिवस पर विशेष –                       

देश की आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानियों की पीड़ा को कम ही सुना गया। उन्हें वह सम्मान भी नहीं मिला जिसके वे वास्तव में हकदार थे। उनके जज्बे को भी कम ही लोग जानते हैं। बरेली नगर के ऐसे ही एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शान्ति शरण विद्यार्थी ने भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान कुंवर दयाशंकर एडवर्ड मेमोरियल (केडीईएम) इंटर कॉलेज पर लहरा रहे ब्रिटिश हुकूमत के यूनियन जैक को उतार कर भारतीय तिरंग  फहरा दिया था। इस पर उन्हें साथियों सहित 9 अगस्त 1942 को गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया। शांति शरण विद्यार्थी उस समय केडीईएम इंटर कालेज में ही विद्यार्थी थे।

शांति शरण जी बताते थे कि तिरंगा फहराने के बाद वह साथियों के साथ जुलूस लेकर कोतवाली तक पहुंचे गए जहां उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। जेल में उनके साथ महानंद सेवक, कृष्ण मुरारी असर, प्रताप चंद्र आज़ाद, दीनानाथ मिश्र, नौरंग लाल और धर्मदत्त वैद्य भी थे। सभी को एक ही बैरक में रखा गया था। लगभग ढाई माह बरेली सेंट्रल जेल में बंद रखने के बाद उन्हें रिहा किया गया।

शान्ति शरण विद्यार्थी का जन्म 8 अक्टूबर 1921 को बरेली में राघव राम वर्मा एडवोकेट के मंझले पुत्र के रूप में हुआ था। जेल जाने के कारण उनकी पढ़ाई बीच मे ही छूट गई। बाद में उन्होंने पूर्वोत्तर रेलवे में भंडार लेखा विभाग में नौकरी की। लगभग 40 वर्ष तक रेलवे की नौकरी के दौरान उन्होंने ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता के कई उदाहरण प्रस्तुत किए जिनका वर्णन कबीर पुरस्कार विजेता समाजसेवी जेसी पालीवाल ने एक समारोह में किया था। उनका विवाह बदायूं के बाबू उमा़शंकर की पुत्री शीला देवी से हुआ था। उनके पांच पुत्र और एक पुत्री हुई जो उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने-अपने क्षेत्र में सफल रहे। 4 मई 2013 को प्रात:काल उनका निधन हो गया।

नियमित त्रिबटीनाथ मंदिर जाने वाले परम शिव भक्त शांति शरण विद्यार्थी अंतिम समय तक सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहे। किशोरावस्था में वह श्रद्धानंद सेवक दल से जुड़े रहे और क्रांतिकारियों की सूचनाएं पहुंचाने का भी काम किया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बरेली आगमन पर उन्होंने पंखा झलकर उनकी सेवा की थी।

आज़ादी के बाद वह देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार से बहुत दुखी होते थे और कहते थे कि इस दिन के लिए देश को आज़ाद नहीं कराया था। ईमानदारी और सत्यनिष्ठा उनकी ज़िंदगी के सबसे बड़े उसूल थे। वह कहते थे कि आज़ादी के बाद भारतीय नागरिक अपने कर्तव्यों को भूल रहा है और देश की सार्वजनिक सम्पत्ति को अपनी सम्पत्ति मान रहा है जो बहुत ग़लत है। आज़ादी की रजत जयंती पर सन् 1972 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने उन्हें ताम्रपत्र भेंट किया था। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों और उनके परिवार को मिलने वाले कोटे तथा आरक्षण को कभी स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि आज़ादी की लड़ाई उन्होंने इसके लिए नहीं लड़ी थी ।

उनके पुत्र राकेश विद्यार्थी और सीए राजेन विद्यार्थी अपने पिता की स्मृति में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शान्ति शरण विद्यार्थी स्मारक ट्रस्ट चला रहे हैं। यह ट्रस्ट लगातार सामाजिक कार्यों में जुटा रहता

निर्भय सक्सेना

(लेखक पत्रकार संगठन उपजा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं)

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