Bareillylive : “ किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सेना या अर्थव्यवस्था में ही नहीं, बल्कि उसके विश्वविद्यालयों में तैयार हो रहे विचारों और शोध में निहित होती है।” यही कारण है कि विश्व के जितने भी शक्तिशाली और विकसित राष्ट्र हैं, जिन्होंने अपेक्षाकृत कम समय में तीव्र प्रगति की है और आज वैश्विक पटल पर मजबूत स्थिति में हैं, उनके विकास में वहां के विश्वविद्यालयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। यह केवल संयोग नहीं, बल्कि एक सुविचारित और दीर्घकालिक रणनीति का परिणाम है।
यदि हम संयुक्त राज्य अमेरिका का उदाहरण लें, तो Massachusetts Institute of Technology (MIT), University of California जैसे संस्थान केवल शिक्षा प्रदान करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे तकनीकी नवाचार, नीति-निर्माण और वैश्विक नेतृत्व में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इसी प्रकार यूनाइटेड किंगडम में University of Oxford और University of Cambridge जैसे विश्वविद्यालय शोध और विचार-निर्माण के प्रमुख केंद्र हैं। इसी प्रकार चीन में Tsinghua University और Peking University जैसे विश्वविद्यालय राष्ट्रीय नीति, तकनीकी विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय को लेने के लिए उस विषय की गहन और समग्र जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है। केवल सतही समझ के आधार पर लिया गया निर्णय दीर्घकालिक रूप से हानिकारक सिद्ध हो सकता है। इसलिए यह अनिवार्य है कि किसी भी विषय—चाहे वह भू-राजनीति हो, आंतरिक सुरक्षा हो, आर्थिक नीति हो या तकनीकी विकास—पर निर्णय लेने से पूर्व व्यापक और गुणवत्तापूर्ण अध्ययन किया जाए।
सरकार में कार्यरत अधिकारी, जो कठिन चयन प्रक्रिया और अनुभव के आधार पर अपनी स्थिति तक पहुंचते हैं, उनकी निर्णय लेने और विश्लेषण करने की क्षमता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। किंतु उनका निर्णय तभी प्रभावी और दूरदर्शी हो सकता है जब उनके पास उच्च गुणवत्ता वाला, तथ्यपरक और निष्पक्ष शोध उपलब्ध हो। यही वह स्थान है जहां विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
विश्व के विकसित देशों में विश्वविद्यालय केवल शिक्षा के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे “थिंक टैंक” के रूप में कार्य करते हैं। वहां के प्रोफेसर, शोधकर्ता और रिसर्च स्कॉलर निरंतर ऐसे विषयों पर अध्ययन करते हैं जो सीधे-सीधे राष्ट्र के भविष्य को प्रभावित करते हैं। उनके शोध के आधार पर सरकारें नीतियां बनाती हैं और देश को नई दिशा मिलती है।
दुर्भाग्यवश, भारत में इस क्षेत्र में अभी भी बहुत कुछ किया जाना शेष है। यहां सामान्यतः शोध का उद्देश्य ज्ञान सृजन से अधिक व्यक्तिगत सुरक्षा—जैसे स्कॉलरशिप प्राप्त करना या स्थायी नौकरी हासिल करना—तक सीमित रह जाता है। विश्वविद्यालयों में कार्यरत कई अध्यापक भी अक्सर केवल पाठ्यक्रम पूर्ण कराने और प्रशासनिक कार्यों तक ही सीमित रह जाते हैं।
इसी प्रकार, शोधार्थियों का एक बड़ा वर्ग अपने शोध को केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम मानता है। उनका ध्यान इस बात पर अधिक रहता है कि उनका शोध शीघ्र पूर्ण हो जाए, उन्हें “डॉक्टर” की उपाधि मिल जाए और वे किसी विश्वविद्यालय या कॉलेज में नौकरी के लिए पात्र बन जाएं। शोध की गुणवत्ता, उसके सामाजिक या राष्ट्रीय प्रभाव, और उससे निकलने वाले नवाचार पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता।
परंतु इन सब से भी अधिक चिंताजनक स्थिति विश्वविद्यालयों की मनोदशा और कार्यप्रणाली की है।आज ऐसे उदाहरण भी देखने को मिलते हैं जहां कुछ विश्वविद्यालय या बड़े संस्थान अपने स्थापना काल में ही अध्यापकों की नियुक्ति धन लेकर करते हैं, और बदले में उन्हें आजीवन नौकरी देने का आश्वासन देते हैं। इतना ही नहीं, कुछ स्थानों पर अध्यापकों और कर्मचारियों को कुछ महीनों का वेतन देकर, उसी वेतन के आधार पर उनके नाम से बैंक से ऋण लेकर संस्थान के कार्यों में उपयोग किया जाता है।
संभव है कि कुछ लोग इसे व्यवसाय करने की एक नई और “स्मार्ट” तकनीक मानें, किंतु इससे एक तथ्य स्पष्ट हो जाता है—यह दृष्टिकोण शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र का नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से व्यापारिक मानसिकता का प्रतीक है। ऐसे वातावरण में न तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा विकसित हो सकती है और न ही राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक गंभीर और निष्पक्ष शोध।यदि भारत को वैश्विक स्तर पर एक सशक्त और अग्रणी राष्ट्र बनना है, तो उसे अपने विश्वविद्यालयों को केवल शिक्षा के केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि शोध, नवाचार और नीति-निर्माण के केंद्र के रूप में विकसित करना होगा।
जब तक हमारे विश्वविद्यालय समस्याओं का समाधान देने वाले केंद्र नहीं बनेंगे, तब तक हम केवल समस्याओं पर चर्चा करने वाला समाज बने रहेंगे।अतः समय की मांग है कि शोध को केवल करियर का साधन न मानकर राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाया जाए, और विश्वविद्यालयों में एक ऐसी संस्कृति विकसित की जाए जो जिज्ञासा, नवाचार और गुणवत्ता को सर्वोपरि मानती हो।
लेखक : अनुज गुप्ता











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