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महाभारत काल के इस कुंए के चारों कोनों से निकलता है अलग स्वाद का जल

पांडव कालीन कुंआ, पांचाल नगरी  शरद सक्सेना, आँवला (बरेली)। महाभारत काल में अचम्भित करने वाली अनेक घटनाएं किम्वदंती बन चुकी हैं। किन्तु एक किम्वदंती साक्ष्य रूप में प्रकट हो तो विश्वास करना ही पड़ता है। अपने बरेली के एक गांव में पांडवकालीन कुंआ है, जिसके जल के स्वाद और तासीर जानने को लोग दूर-दूर से इसका जल पीने आते हैं।

जीहां, हम बात कर रहे हैं आंवला तहसील के रामनगर क्षेत्र की। महाभारत कालीन पांचाल नगरी में अहिच्छत्र जैन मंदिर के ठीक सामने स्थित है यह कुआं। मान्यता है कि इस अति प्राचीन कुएं के जल को ग्रहण करने से विभिन्न प्रकार के रोग जड़ से समाप्त हो जाते हैं। दूर-दूर से लोग इसका जल पीने आते है तथा यहां से जल भरकर ले जाते हैं। पर्यटक जब पांडव कालीन ऐतिहासिक राजा दु्रपद का किला, भीमगदा, व थीम पार्क के साथ भगवान पार्श्वनाथ की तपोभूमि के दर्शन करते हैं तो इस कुंए के बारे में जानकर इसका जल बिना ग्रहण किए नहीं रह पाते।
इतिहास बताता है कि 1857 में यवनों ने मंदिर पर आक्रमण किया तो मंदिर का माली मंदिर की मूर्तियों को लेकर इस कुंए में छिप गया। माली कई दिनों तक मूर्तियों को अपने हृदय से लगाए इस कुंए में छिपा रहा, मूर्तियों की शक्ति व प्रभाव से इस कुंए के जल में ऐसा चमत्कार हुआ कि इसके जल का सेवन करने से श्रद्धालुओं के समस्त रोगों का निवारण हो जाता है।

चारों कोनों में निकलता है भिन्न स्वाद का जल

कुंए के चारों कोनों में अलग-अलग रंग व अलग-अलग स्वाद का जल निकलता है। यह जल आश्चर्यजनक रूप से मीठा व स्वादिष्ट लगता है। गौर से देखने पर अलग-अलग कोने के जल में अलग-अलग रंग प्रतीत होता है। पर्यटक इस जल को अपने साथ भरकर भी ले जाते हैं।

अब कुंए के बाहर घड़ां और मटकों में पानी भरकर यहां मौजूद सेवक टेकचंद आने जाने लोगांं को जल पिलवाते हैं। पर्यटक बड़ी श्रद्धा से इस जल को ग्रहण करते हैं।

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