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ऑक्सीजन के अभाव में टूटती सांसें

कोरोना का संक्रमण जितनी प्रचंड गति से बढ़ रहा है उसका अंदाजा शासन-प्रशासन किसी को नहीं था। प्रतिदिन चार लाख से अधिक संक्रमितों का बढ़ जाना हैरान कर देने वाला है। संक्रमितों का ग्राफ इतनी तेजी से बढ़ने के कारण अस्पतालों में उपलब्ध संसाधन नाकाफी साबित होते जा रहे हैं। कहीं ऑक्सीजन का अभाव है तो कहीं वेंटीलेटर्स का, कहीं बैड नहीं है, तो कहीं इंजेक्शन कम पड़ रहे हैं। सबसे बड़ी किल्लत ऑक्सीजन सिलेण्डरों की है। प्रतिदिन दसियों मरीजों की सांसें ऑक्सीजन के अभाव में टूट रही हैं।

स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए सरकारें ऑक्सीजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु रात-दिन प्रयास कर रही हैं। ऑक्सीजन की कमी दूर करने हेतु नए ऑक्सीजन प्लांट लगाने के प्रयास हो रहे हैं मगर ये रातों-रात लग नहीं सकते। विदेश से भी ऑक्सीजन के सिलेण्डर आयात किए जा रहे हैं मगर इन सब कामों में समय लगेगा, तब तक समस्या कितना विकराल रूप धारण कर लेगी कुछ कहां नहीं जा सकता।

इसलिए चिकित्सकों एवं वैज्ञानिकों को ऑक्सीजन के विकल्प तलाशने होंगे। इन विकल्पों का प्रयोग अपेक्षाकृत कम गम्भीर मरीजों के लिए किया जा सकता है। स्वास्थ्य मंत्रालय मरीजों की तीन कैटागिरी बना सकता है। अति गम्भीर मरीजों को ऐसे अस्पतालों में भर्ती किया जाए जहां ऑक्सीजन सिलेण्डर और वेंटीलेटर दोनों उपलब्ध हों। अपेक्षाकृत कम गम्भीर मरीजों के लिए लाइफ सपोर्ट सिस्टम की आवश्यकता नहीं है। उन्हें ऐसे अस्पतालों में शिफ्ट किया जाना चाहिए जहां पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन सिलेण्डर उपलब्ध हों। तीसरी कैटागिरी के मरीज जो संक्रमण के शुरुआती दौर में हैं उन पर ऑक्सीजन के विकल्प जैसे प्राणायाम आसन, मेडीसन आदि का प्रयोग किया जा सकता है। मरीजों की यह श्रेणी पूरी तरह से पारदर्शी होनी चाहिए।

निकट भविष्य में संक्रमण भयावह रूप धारण कर सकता है। ऐसे में मरीजों के लिए अस्पतालों का भी अभाव हो सकता है। इससे निपटने के लिए अच्छे संसाधन वाले स्कूल-कालेजों को अस्थाई कोविड अस्पताल बनाया जा सकता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी की भी सांसें ऑक्सीजन अथवा इलाज के अभाव में नहीं टूटने पाएं।

सुरेश बाबू मिश्रा

(साहित्यकार एवं पूर्व प्रधानाचार्य)

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