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अब भारत सरकार नेताजी को दे रही अपेक्षित सम्मान

नेताजी सुभाष चंद्र बोस 1

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भव्य प्रतिमा लगवाने की घोषणा करके करोड़ों नेताजी प्रेमियों का हृदय जीत लिया है। देश में आजादी का अमृत महोत्सव मनाते समय भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महानायक की प्रतिमा लगवाने का यह सर्वाधिक उचित अवसर है। ग्रेनाइट की बनी नेताजी की भव्य प्रतिमा इंडिया गेट पर उसी स्थान पर लगेगी जहां इंग्लैंड के सम्राट जॉर्ज पंचम की प्रतिमा लगी थी और जिसे 1968 में हटा दिया गया था। नेताजी की ग्रेनाइट की प्रतिमा तैयार होने से पूर्व आज 23 जनवरी को उनकी 125वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री इंडिया गेट पर नेताजी की होलोग्राम प्रतिमा का अनावरण करेंगे। यह केंद्र सरकार का स्वागत योग्य कदम है।

इसके पूर्व भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 दिसंबर 2018 को पोर्ट ब्लेयर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद सरकार की हीरक जयंती मनाते समय अंडमान के रॉस आईलैंड का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप, नील आईलैंड का नाम शहीद द्वीप और हैवलॉक आईलैंड का नाम स्वराज्य द्वीप कर दिया था। अंग्रेज हुकूमत ने नील आइलैंड का नाम भारत में 1857 के विद्रोह को क्रूरता से कुचलने वाले ईस्ट इंडिया कंपनी के ब्रिगेडियर जनरल जेम्स जॉर्ज स्मिथ नील के सम्मान में रखा था। उसने 1857 में इलाहाबाद में भारतीय देशभक्तों की बेरहमी से हत्याएं की थीं और आम नागरिकों के घर जलवाए थे।     

इसी तरह हैवलॉक आईलैंड का नाम अंग्रेजों ने मेजर जनरल हेनरी हैवलॉक के सम्मान में रखा था जिसने 1857 में कानपुर में भारतीय देशभक्तों पर बहुत जुल्म ढाए थे। यह दुर्भाग्यपूर्ण बात थी कि उन अंग्रेज सैन्य अधिकारियों के नाम पर हमारे देश के इन द्वीपों के नाम आजादी के सात दशकों बाद तक यथावत बने हुए थे। मोदी सरकार ने राष्ट्रीय शर्म के इन प्रतीकों को हटा दिया।

अंडमान निकोबार दीप समूह में रॉस आईलैंड अंग्रेज हुकूमत का मुख्यालय था जिसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप नाम दिया गया है। दिसंबर 1943 में नेताजी इस द्वीप में ठहरे थे जब यह समूचा द्वीपसमूह उनकी आजाद हिंद सरकार के अधिकार में आ गया था।

वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा पूर्व में नेताजी के जन्मदिन को पराक्रम दिवस घोषित करने तथा लालकिले में उनके नाम पर संग्रहालय बनवाकर उनको सम्मान देने के जो प्रयास किए गए हैं वे निश्चित रूप से बहुत सराहनीय हैं। अब केंद्र सरकार से अपेक्षा है कि वह देश के इतिहास और पाठ्य पुस्तकों में भी नेताजी के महान कार्यों और आजाद हिंद फौज की शौर्य गाथाओं को उचित स्थान दे।

रणजीत पांचाले

(जाने-माने इतिहासकार)

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