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पृथ्वी दिवस: प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संकटों के बीच संतुलन की पुकार

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हर साल 22 अप्रैल को मनाया जाने वाला पृथ्वी दिवस एक वैश्विक आंदोलन बन चुका है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण की रक्षा करना और टिकाऊ जीवनशैली को बढ़ावा देना है। इस वर्ष, पृथ्वी दिवस पर न केवल पर्यावरणीय चेतना को दोहराया जा रहा है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं से प्रेरणा लेकर पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान की दिशा में विचार हो रहा है।

वेदों से मिलती है स्थिरता की सीख

डॉ. दीपिका मिश्रा,
सहायक प्रोफेसर, शिक्षा विभाग, इनवर्टिस यूनिवर्सिटी

प्राचीन भारतीय वेदों और उपनिषदों में पर्यावरण को केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि ईश्वर का प्रतिरूप माना गया है। वैदिक दर्शन पंचमहाभूतों– पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को जीवन का आधार मानता है। इन तत्वों के साथ संतुलन बनाए रखना न केवल भौतिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, बल्कि यह आत्मिक संतुलन की भी कुंजी है।
ऋग्वेद के मंत्रों और तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षाओं में बार-बार यह संदेश मिलता है कि प्रकृति का सम्मान करना और उसके साथ सामंजस्य बनाकर जीना हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है।

PFAS आधुनिक युग का पर्यावरणीय जहर

इस पृथ्वी दिवस पर एक और गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है– PFAS, यानी Per- and Polyfluoroalkyl Substances। इन्हें “Forever Chemicals” कहा जाता है, क्योंकि ये दशकों तक पर्यावरण में बने रहते हैं और मिट्टी, जल और वायु को दूषित करते हैं। नॉन-स्टिक बर्तन, वाटरप्रूफ कपड़े, फूड पैकेजिंग और अग्निशमन फोम जैसे रोज़मर्रा के उत्पादों में इनका व्यापक उपयोग होता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, PFAS मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक हैं, जिनसे कैंसर, हार्मोनल असंतुलन और प्रतिरक्षा प्रणाली पर प्रभाव पड़ सकता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से PFAS का प्रभाव भारतीय आयुर्वेद में विषैले अवशेषों को ‘अमा’ कहा गया है, जो शरीर की ऊर्जा को अवरुद्ध करते हैं। ठीक उसी तरह, PFAS पृथ्वी के पर्यावरण को दूषित करके उसके संतुलन को बिगाड़ते हैं। इससे न केवल पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरा आध्यात्मिक संबंध भी टूटता है।

पृथ्वी के साथ पुनः जुड़ने का समय

पृथ्वी दिवस सिर्फ़ एक दिन नहीं, बल्कि जीवन शैली का संकल्प बनना चाहिए। यदि हम प्राकृतिक तत्वों का सम्मान करें, वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से लें और सामूहिक जिम्मेदारी को अपनाएं, तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ और संतुलित धरती का निर्माण कर सकते हैं।

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