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लोकसभा चुनावः आंवला में विकास के मुद्दे पीछे, जातिगत गोलबंदी रही हावी

कुल मतदाता – 1770444 अल्पसंख्यक – करीब पौने चार लाख

शरद सक्सेना, आंवला। उत्तर प्रदेश के दो जिलों बरेली और बदायूं में फैले आंवला लोकसभा क्षेत्र में विकास के मुद्दे पीछे और अधिकांशतः जातिगत गोलबंदी हावी रही है। यही कारण रहा कि इस क्षत्रिय बहुल लोकसभा क्षेत्र से कुंवर सर्वराज सिंह अलग-अलग दलों के टिकट पर तीन बार जबकि भाजपा के राजवीर सिंह भी तीन बार संसद पहुंचे। आछू बाबू को यहां की जनता ने दो बार संसद की राह दिखाई। लेकिन, मतदाताओं ने 2014 के लोकसभा चुनाव में इस मिथक को तोड़ा और मोदी लहर में भाजपा के धर्मेंद्र कश्यप ने बड़े अंतर के साथ इस सीट पर जीत हासिल की और संसद पहुंचे।

वर्ष 2009  के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और महानदल का गठबंधन था। समझौते के तहत इस सीट पर गठबंधन प्रत्याशी के रूप में मुस्लिम सकलैनी चुनाव लड़े थे। सकलैनी को 62 हजार वोट मिले जिसका सीधा लाभ भाजपा को पहुंचा और मेनका गांधी करीब साढ़े 6 हजार मतों से विजयी हुईं  जबकि दूसरे स्थान पर सपा के धर्मेंद्र कुमार रहे। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बाबजूद कांग्रेस के सलीम इकबाल शेरवानी 94 हजार वोट ले गए थे जिसका पूरा लाभ भाजपा को मिला और धर्मेंद्र कश्यप एक लाख 38 हजार मतों से विजयी हुए। दूसरे स्थान पर सपा के कुंवर सर्वराज सिंह रहे।     

इस बार के लोकसभा चुनाव में किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल ने मुस्लिम चेहरा नहीं उतारा है। पिछले चुनावों में मुस्लिम उम्मीदवार के चलते भाजपा को ध्रुवीकरण का पूरा लाभ मिलता था पर इस बार एक भी मुस्लिम चेहरा न होने से उसको ध्रुवीकरण का लाभ मिलता हुआ नहीं दिखा रहा है।  भाजपा ने यहां के अपने सिटिंग सांसद धर्मेंद्र कश्यप को ही टिकट दिया है जबकि महगठबंधन से बिजनौर की पूर्व विधायक रुचि वीरा मैदान में हैं। पिछले कई चुनावों से यहां जीत के लिए तरस रही कांग्रेस ने इस बार जीत की आस में तीन बार के सांसद कुंवर सर्वराज सिंह पर दांव लगाया है। साफ है कि इस बार मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण जैसा कुछ होने के आसार नहीं हैं। ऐसे में भाजपा को राम के नाम और नरेंद्र मोदी के नाम का ही सहारा है।

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