Bareillylive : आनन्दमार्ग स्कूल इटौआ सुखदेवपुर, बरेली में आनन्दमार्ग प्रचारक संघ द्वारा आयोजित प्रथम डायोसिस सेमिनार (13-15 फरवरी 2026) में वरिष्ठ आचार्य आचार्य संपूर्णानंद अवधूत ने ‘साधना’ विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने आनन्दमार्ग की साधना के तीन प्रमुख स्तरों—शाक्त, वैष्णव और शैव—का उल्लेख करते हुए कहा कि इनका पारमार्थिक मूल्य समान है। कोई भी स्तर साधक को ब्रह्म प्राप्ति के पथ पर ले जाता है। आचार्य जी ने बताया कि शाक्त साधना भोग और कर्म प्रधान है, जहां जैव भाव से शिव भाव तक पदयात्रा प्रत्याहार योग के माध्यम से होती है। यह स्तर जगत सेवा की शुरुआत करता है। वैष्णव स्तर में निःस्वार्थ भक्ति का उदय होता है, जबकि कर्म और भक्ति दोनों प्रधान रहते हैं। शैव स्तर ज्ञान स्वरूप का भाव प्रदान करता है, जो ब्रह्मस्वरूपता की ओर ले जाता है।
प्रत्याहार साधना के चार चरण
प्रत्याहार साधना के चार स्तरों—यतमान, व्यतिरेक, एकेन्द्रिय और वशीकार—की विस्तृत व्याख्या करते हुए आचार्य संपूर्णानंद ने कहा कि यतमान में वृत्ति प्रवाह को रोकने का प्रयास होता है, जहां मानसिक वृत्तियां निम्न की ओर उन्मुख रहती हैं। व्यतिरेक में कई वृत्तियां नियंत्रित हो जाती हैं। एकेन्द्रिय अवस्था में वृत्तियां निम्न से ऊर्ध्व की ओर मुड़ती हैं, किंतु स्वाभाविक भाव बना रहता है। वशीकार अवस्था में अस्तित्व महत् तत्व की ओर उन्मुख होता है, मन आत्मा के पूर्ण नियंत्रण में आ जाता है तथा साधक 50 मूल वृत्तियों पर विजय पा लेता है। अंत में जीव भाव का ईश्वर भाव में रूपांतरण हो जाता है।
एकमात्र पथ: ब्रह्म प्राप्ति
आचार्य जी ने मत और पथ के भेद पर जोर देते हुए स्पष्ट किया कि आनन्दमार्ग कोई विशेष मत, देश, काल या पात्र का समर्थक नहीं है। मत देश-काल-पात्रानुसार बदलते हैं, किंतु पथ एक ही है—ब्रह्म प्राप्ति का पथ। जीव विभिन्न विषयों से समन्वय स्थापित कर समग्र जीवन को आध्यात्मिक रूपांतरित करता है। “जितने मत, उतने पथ” यह भ्रांति है; आनन्दमार्ग के अनुसार ब्रह्मप्राप्ति ही परम गति है। सेमिनार में साधकों ने इन शिक्षाओं पर गहन चर्चा की, जो आनन्दमार्ग की वैश्विक परंपरा को मजबूत करती है







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