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विचारणीय लेख : एक आत्म-चिंतन: चंदा चोरी से आगे, स्व के बोध से बंद होंगी य़ह चोरियाँ

’मुद्दा गर्म है…’

Bareillylive : आजकल एक मुद्दा सुनते-सुनते, पढ़ते-पढ़ते मन में विचार आया कि जिधर देखो, उधर एक ही विषय की चर्चा हो रही है – चंदा चोरी। सभी किसी न किसी को आरोपी बना रहे हैं। एसआईटी गठित हो चुकी है, ट्रस्ट के महासचिव व अन्य बन्धुओं का त्यागपत्र स्वीकार हो चुका है। कानून अपनी कार्यवाही कर रहा है, अन्य पहलुओं पर भी ध्यानाकर्षण किया जा रहा है, परंतु मुद्दा अभी भी गर्म है और शायद कुछ तथाकथित लोग इसे गर्म बनाए रखना चाहते हैं।

लेकिन यदि हम स्वयं अपने बारे में सोचे, तो हम नित्य के क्रियाकलापों के द्वारा किसी न किसी चीज/वस्तु या कुछ अन्य की प्रतिदिन चोरी कर रहे हैं, इसकी एसआईटी कब बनेगी, किस महालेखा नियंत्रक से जांच करवायेंगे। सुबह से ही दिन भर में कितनी बार चोरी करते है। चोरी क्या है? चोरी वह है- जब हम समझने लगते है कि कोई हमें नहीं देख रहा है। अतः प्रतिदिन की भागम-भाग में हम चौराहे पर जलती लालबत्ती को अनदेखा करते हैं, इधर-उधर देखते हैं कि कोई पुलिस वाला तो नहीं देख रहा है, तो तीन सवारी युक्त मोटर साइकिल चौराहा पार कर जाती है, वह भी बिना हेलमेट लगाए। क्या यह चोरी नहीं है?

इसी प्रकार भागते-भागते ऑफिस पहुंचते हैं, ऑफिस का समय क्या है? लेकिन हम इधर-उधर देखते हैं कि कोई देख तो नहीं रहा है, हमारे मन और दिल को शांति मिलती है। कोई यदि मिल जाए, पूछ बैठे तो तरह-तरह की बातें बना देते हैं, तो क्या यह चोरी नहीं है?

आज सर्वत्र यह माहौल देखने को मिल जायेगा। यह चोरियां तब तक नहीं रूकेंगी, जब तक हम किसी भी कार्य को, किसी भी जगह को अपना नहीं मानेंगे। जिस दिन से हमें यह आभास होने लगेगा कि कार्य मेरा है, यह जगह मेरी है। उसी दिन से यह चोरियां बन्द हो जायेंगी।
कोई भी कानून या कोई भी अदालत चोरियां बन्द नहीं करा सकती है, चोरियां केवल अपनेपन अर्थात स्व के बोध से ही रूक सकती है। यह स्व का बोध एक दिन में जागृत नहीं होगा, उसके लिए नित्य साधना की आवश्यकता होगी। जिस प्रकार नित्य कुएं से पानी निकालने में एक मामूली सी रस्सी कुएं के मुडेर पर निशान बना सकती है, तो स्व के बोध की साधना भी हमारे अंदर परिवर्तन ला सकती है।

स्व के बोध का जागरण तभी हो पायेगा, जब इस धरती, इस भूमि को अपना मानेंगे। जब इस भूमि से लगाव होगा, तभी हमारे अन्दर परिवर्तन आ सकेगा। परिवर्तन भी सकारात्मक बातों/विचारों से आ सकता है। विभिन्न महापुरूषों ने समय-समय पर सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है। हम उस मार्ग का अनुसरण करें।

गर्म-गर्म मुद्दे में ही एक मुद्दा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी है, जिसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने स्वयं को गुरू स्थान पर स्थापित न कर सत्य सनातन काल से प्रेरणा देने वाले परम पवित्र भगवाध्वज को गुरू स्थान पर स्थापित किया। उनका कहना था कि जिस व्यक्ति को आज आप आदर्श मान रहे हैं, मनुष्य होने के नाते कोई दुर्गुण आने के कारण हमारी बुद्धि तुरंत क्षीण हो जाती है। हम स्वयं फिर भला-बुरा कहने लगते हैं। इससे हमारी भी साधना नष्ट होने लगती है। अतः यदि हम इस भूमि से जुड़े रहें, इसके साथ अपनापन रहा, तो फिर स्व के बोध का जागरण अवश्य होगा।

भारत माता की जय!

कीर्ति कुमार जी। सामाजिक कार्यकर्ता

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