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तू किसी रेल सी गुजरती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूं लोकप्रिय हिन्दी ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार की ९३वीं जयंती पर लेख

तू किसी रेल सी गुजरती है

Bareillylive : हिंदी में ग़ज़ल लिखने की परंपरा अमीर खुसरो से मानी जाती है। प्राचीन एवं नये अनेकानेक ग़ज़लकारों ने इस विधा को अपने – अपने तरीके से लोकप्रिय बनाने का भरपूर प्रयास किया। कई ग़ज़लकारों ने ग़ज़ल की प्रचलित विधा से अलग एक नये तेवर के साथ ग़ज़ल को प्रस्तुत कर नये आयाम स्थापित करने की कोशिश की और सफल भी हुए।

इन सबके बीच ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार ने जनमानस को छूने वाले व्यावहारिक और तीखे तेवर के साथ ग़ज़ल को जनता की आवाज़ बनाकर उन्हीं की भाषा में जो ग़ज़लें लिखी, तो अनेक साहित्यकार यह मानने लगे कि दुष्यंत कुमार ने हिंदी में ग़ज़ल कहने की परंपरा को अपने नाम कर लिया है।

ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार ने मानव मन के आंतरिक संबंधों, सामाजिक विडंबनाओं, और वर्तमान अव्यवस्था के विरुद्ध जो सलीके से करारी चोट की और साथ ही समाधान प्रस्तुत किया, तो लोग दुष्यंत कुमार के कायल हो उठे।

दुष्यंत कुमार के समय का कोई और शायर हिंदी में वो चमत्कार पैदा नहीं कर पाया, जो दुष्यंत कुमार की मात्र 52 ग़ज़लों ने कर दिखाया और उनकी कृति “साये में धूप” जन – जन के गले का कंठहार बन गई। जनता के शब्द, जनता के भाव, जनता की आवाज़ और जनता का पक्ष दुष्यंत कुमार की लेखनी के अमिट हिस्से बन गये। इसीलिए वो स्वयं लिखते हैं-


” मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूं
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूं।
तू किसी रेल सी गुजरती है,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूं।। “

जनमानस के विद्रोह को पंख , छटपटाती राजनीतिक कराह की आशा , कुचलती हुई आवाज़ का सहारा जब दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों की गूंज लोगों को सुनाई दीं, तो चारों ओर एक ही नाम साहित्य जगत में सुनाई देने लगा और वो नाम था दुष्यंत कुमार। ये पंक्तियां कितनी सार्थक सिद्ध हुईं, जब दुष्यंत कुमार कहते हैं –


” कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए।
कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।
यहां दरख्तों के साए में धूप लगती है,
चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए।। “


सुप्रसिद्ध साहित्यकार डाॅ. सरजू प्रसाद मिश्र इसीलिए दुष्यंत कुमार के विषय में सटीक टिप्पणी करते हुए कहते हैं –

“यदि दुष्यंत कुमार अपनी प्रभावशाली ग़ज़लों के कारण हिंदी कविता पर छा न गए होते, तो नये कवियों का ध्यान एकमात्र ग़ज़ल अपनाने की ओर न जाता। दुष्यंत कुमार ने उर्दू मुहावरे के बहुत करीब जाकर अपनी ग़ज़लों में वह विषय वस्तु भरी, जो आज की कविता के लिए अनिवार्य थी…


हिंदी ग़ज़ल की परंपरा भले ही अमीर खुसरो और कबीर से मानी जाए, उसकी सही चाल दुष्यंत से ही शुरू हुई क्योंकि दुष्यंत ही हिंदी के प्रथम कवि हैं, जिन्होंने उर्दू ग़ज़ल की चुनौती स्वीकार की और ग़ज़ल को गंभीरता से लिया तथा अपना संपूर्ण रचनात्मक व्यक्तित्व उसके लिए समर्पित किया। “

कोई आंदोलन हो, किसी कार्यक्रम के संचालन में चार चांद लगाने हों, किसी की तिलमिलाहट को शब्द देना हो, हर जगह दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों का प्रयोग एक आवश्यकता बन गया। दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां कितनी सटीक बैठती हैं, एक उदाहरण देंखे – ” इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,


नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है।
एक चिंगारी कहीं से ढ़ूंढ़ लाओ दोस्तों,
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है।। “
और भी अवलोकन करें-
“हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।। “”

दुष्यंत कुमार के साहित्य पर विशेष कार्य एवं शोध करने वाले डाॅ सरदार मुजा़हिर ने स्पष्ट लिखा है –

“शमशेर के बाद हिंदी ग़ज़लों में एक नये युग की शुरुआत होती है, जिसे हम सामाजिक यथार्थ का युग कह सकते हैं। हिंदी के ग़ज़लकारों ने बदलते परिवेश को अपनी ग़ज़लों के माध्यम से व्यक्त किया है। हिंदी की ये ग़ज़लें आम आदमी की समस्याओं से जुड़ गईं हैं। ये ग़ज़लें समयगत सच्चाइयों का एक अनूठा दस्तावेज बनकर सामने आती हैं। शमशेर बहादुर से प्रेरणा प्राप्त कर जो कवि हिंदी में चमक उठा है, वह है दुष्यंत कुमार त्यागी। हिंदी ग़ज़लों को जिसने प्रतिष्ठा दिलाई, जिसने ग़ज़लों को अस्मिता प्रदान की, वे दुष्यंत कुमार हिंदी के एक महान कवि और ग़ज़लकार साबित होते हैं। ” साये में धूप ” के माध्यम से उन्होंने ग़ज़लों की दुनिया में कदम रखा। “

जन- जन के मन को स्पर्श करने में सक्षम लोकप्रिय ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार की 93 वीं जयंती पर यही कामना है कि उनकी ग़ज़लों से प्रेरणा लेकर हिंदी की ग़ज़लें अपना और भी प्रतिष्ठापूर्ण स्थान प्राप्त करें। उनकी इन पंक्तियों से हम उनका पुनः भावपूर्ण स्मरण कर सकते हैं –

“ये जुबां हमसे सी नहीं जाती,
जिंदगी है कि जी नहीं जाती।
देखिए उस तरफ उजाला है,
जग तरफ रौशनी नहीं जाती।।
मयकशी मय जरूर है लेकिन,
इतनी कड़वी कि पी नहीं जाती।।
मुझको इंसा बना दिया तुमने,
अब शिकायत भी की नहीं जाती।। “

लेखक: इंद्र देव त्रिवेदी

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