डॉ. राघवेंद्र शर्मा
(विनायक फीचर्स)
लेखक मध्य प्रदेश योग आयोग के कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त अध्यक्ष हैं।
bareillylive@bareillynews:गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर जब संपूर्ण सृष्टि विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश के स्वागत में लीन होती है, तब केवल उत्सव मनाना ही पर्याप्त नहीं है। सच्चा उत्सव तभी सार्थक होता है, जब हम भगवान गणेश की दिव्य कार्यशैली, उनके स्वरूप और आचरण के पीछे छिपे जीवन-दर्शन को अपने भीतर उतारें। आज के दौर में, जब मानवीय संवेदनाएं क्षीण होती जा रही हैं और भौतिकता का प्रभाव बढ़ रहा है, भगवान गणेश का प्रत्येक कार्य हमें जीवन जीने की श्रेष्ठ राह दिखाता है।
माता-पिता के प्रति अनन्य भक्ति की सीख
भगवान श्री गणेश की सबसे पहली सीख माता-पिता के प्रति अनन्य भक्ति है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब ब्रह्मांड की परिक्रमा करने की प्रतियोगिता हुई तो सभी देवता अपने-अपने तीव्रगामी वाहनों पर निकल पड़े। कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर सवार होकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करने चले गए।
गणेश जी के लिए जीत-हार से अधिक महत्वपूर्ण सत्य था। उन्होंने जाना कि संपूर्ण सृष्टि का सबसे बड़ा सत्य, सबसे बड़ा तीर्थ और सबसे बड़ा आश्रय उनके माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती ही हैं। उन्होंने सहज भाव से अपने माता-पिता की परिक्रमा की और उन्हें ही अपना संपूर्ण संसार माना। परिणामस्वरूप वे विजयी हुए और उन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान प्राप्त हुआ।
आज जब युवा पीढ़ी के कुछ हिस्सों में माता-पिता की उपेक्षा, उन्हें अकेला छोड़ने अथवा वृद्धाश्रम भेजने जैसी प्रवृत्तियां देखने को मिलती हैं, तब श्री गणेश का यह चरित्र पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शक बन जाता है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि माता-पिता का सम्मान और उनकी सेवा जीवन के सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्यों में से एक है।
विशाल उदर और बड़े कानों में छिपा जीवन-दर्शन
भगवान गणेश का स्वरूप केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन-सूत्रों का अद्भुत समावेश है।
उनका विशाल उदर हमें बातों को पचाने की कला सिखाता है। इसका संदेश है कि दूसरों की बुराइयों, आलोचनाओं, प्रशंसा और गोपनीय बातों को धैर्यपूर्वक अपने तक रखने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। एक व्यक्ति की बात दूसरे तक पहुंचाकर विवाद और कलह पैदा न करना चरित्र की श्रेष्ठता है।
इसी प्रकार उनके बड़े कान हमें कुशल श्रोता बनने की सीख देते हैं। जीवन में सफलता के लिए दूसरों को सहृदयता से सुनना और समझना जरूरी है। बोलने से अधिक सुनने का अभ्यास व्यक्ति को विवेकशील और ज्ञानी बनाता है। बड़े कान सजग और सतर्क रहने का संदेश भी देते हैं।
छोटी आंखें सिखाती हैं सूक्ष्म दृष्टि
गणेश जी की छोटी आंखें सूक्ष्म दृष्टि का प्रतीक मानी जाती हैं। यह सीख देती हैं कि किसी भी छोटी वस्तु या व्यक्ति को तुच्छ नहीं समझना चाहिए और न ही किसी महत्वपूर्ण बात को नजरअंदाज करना चाहिए।
अक्सर मनुष्य बाहरी चमक-दमक देखकर किसी व्यक्ति या वस्तु का आकलन कर लेता है, जो उचित नहीं है। छोटी आंखें यह संदेश भी देती हैं कि यदि ईश्वर ने हमें बड़ा व्यक्तित्व, उच्च पद या विशेष क्षमताएं दी हैं तो उस पर अहंकार नहीं करना चाहिए। अहंकार मनुष्य के पतन का बड़ा कारण बन सकता है।
लंबी सूंड देती है सजगता का संदेश
भगवान गणेश की लंबी सूंड सतर्कता और संवेदनशीलता का प्रतीक है। जिस प्रकार हाथी की सूंड दूर से ही किसी खतरे या गंध का आभास कर सकती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने भीतर ऐसी बौद्धिक क्षमता विकसित करनी चाहिए, जिससे वह अपने आसपास मौजूद संभावित खतरों को समय रहते पहचान सके।
यह हमें परिस्थितियों को समझने, दूरदृष्टि रखने और समय के संकेतों को पहचानने की प्रेरणा देती है।
आंतरिक शक्ति ही वास्तविक शक्ति
हाथी के स्वरूप से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण सीख है कि वास्तविक सामर्थ्य हमेशा बाहरी रूप से दिखाई नहीं देती। गणेश जी का स्वरूप हमें समझाता है कि प्रतिष्ठा और उपलब्धियों से अधिक महत्वपूर्ण हमारी आंतरिक योग्यता, विवेक और क्षमता है।
समाज को दिखाई देने वाली उपलब्धियों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण वे गुण हैं, जो व्यक्ति के भीतर मौजूद होते हैं और उसके जीवन को सही दिशा देते हैं।
अंकुश देता है आत्म-अनुशासन का संदेश
भगवान गणेश के हाथों में धारण किए गए अस्त्र भी गहन जीवन-दर्शन प्रस्तुत करते हैं। उनके एक हाथ में अंकुश है, जो आत्म-संयम और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है।
इसका संदेश है कि समाज, कानून या शासन हमें अनुशासित करे, उससे पहले हमें स्वयं को अनुशासित करना सीखना चाहिए। स्व-अनुशासन ही वास्तविक स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का मार्ग है।
विशाल गणेश और छोटा मूषक
विशालकाय गणेश जी की सवारी एक छोटा-सा मूषक है। यह विरोधाभास अपने भीतर गहरा संदेश समेटे हुए है। यह हमें सिखाता है कि हमारी भौतिक आवश्यकताएं सीमित होनी चाहिए और उपलब्ध संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए।
मूषक सीमित संसाधनों में भी अपना रास्ता बना लेता है। इसी प्रकार जीवन में सीमित साधनों का अधिकतम उपयोग करने की क्षमता व्यक्ति को आगे बढ़ाती है।
पूजा के साथ आत्ममंथन भी जरूरी
इसलिए गणेश चतुर्थी केवल पूजा-अर्चना और उत्सव तक सीमित न रहे, बल्कि इसे आत्ममंथन का अवसर भी बनाया जाना चाहिए। श्री गणेश की दूरदर्शिता, माता-पिता के प्रति भक्ति, संयम, सहृदयता, सजगता, आत्म-अनुशासन और सादगी को अपने आचरण में उतारना ही उनकी सच्ची आराधना है।
यदि हम भगवान गणेश के इन जीवन-सूत्रों को अपने दैनिक व्यवहार का हिस्सा बना लें तो एक अनुशासित, सहिष्णु, संवेदनशील और संस्कारवान समाज का निर्माण संभव है।
यही विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश के चरणों में हमारी सच्ची पुष्पांजलि होगी।






Leave a Reply