The Voice of Bareilly since 2010

विश्व पटल पर नए-नए प्रतिमान गढ़ रही हिन्दी

विश्व पटल पर नए-नए प्रतिमान गढ़ रही हिन्दी

सुरेश बाबू मिश्रा
साहित्यभूषण

bareillylive@bareillynews:विश्व में हिन्दी बोलने वाले लोगों की संख्या लगभग 70 करोड़ बताई जाती है। हिन्दी विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में प्रमुख स्थान रखती है। अंग्रेजी और मंदारिन के बाद हिन्दी का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है। इसके बाद स्पेनिश और अरबी जैसी भाषाएं प्रमुख हैं।

वर्तमान समय में इंटरनेट ने हिन्दी को वैश्विक स्तर पर पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पिछले एक दशक में हिन्दी की लोकप्रियता और स्वीकार्यता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आज हिन्दी विश्व के अनेक देशों में पढ़ी और पढ़ाई जाती है। भारत के बाहर भी कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी का अध्ययन और अध्यापन हो रहा है। हिन्दी फिल्मों, गीतों और भारतीय संस्कृति के प्रति बढ़ती रुचि के कारण दुनिया के अनेक हिस्सों में लोग हिन्दी सीख रहे हैं।

वेब मैगजीन, ई-बुक्स, ई-मेल और सोशल मीडिया ने हिन्दी के विस्तार को नई गति दी है। हिन्दी को समझने और बोलने वालों की संख्या बढ़ने के साथ दुनिया की अनेक वेबसाइटें और डिजिटल प्लेटफॉर्म हिन्दी को महत्व दे रहे हैं। तकनीकी क्षेत्र की बड़ी कंपनियां भी भारत के विशाल बाजार को देखते हुए हिन्दी में सेवाएं उपलब्ध कराने पर जोर दे रही हैं।

दुनिया के अनेक देशों में हिन्दी की पहुंच

नेपाल, अमेरिका, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, यमन, युगांडा, जर्मनी, न्यूजीलैंड और सिंगापुर सहित दुनिया के अनेक देशों में हिन्दी बोलने और समझने वाले लोग मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय मूल के लोगों की बड़ी आबादी वाले देशों में हिन्दी आज भी सांस्कृतिक और सामाजिक संपर्क की महत्वपूर्ण भाषा बनी हुई है।

देश के दक्षिणी राज्यों में भी हिन्दी के प्रति रुचि बढ़ी है। तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में हिन्दी समझने और बोलने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पूर्वोत्तर के असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और त्रिपुरा जैसे राज्यों में भी हिन्दी सीखने की प्रवृत्ति बढ़ना हिन्दी के लिए शुभ संकेत है।

सोशल मीडिया ने युवा साहित्यकारों को दिया मंच

फेसबुक, व्हाट्सऐप, एक्स, ब्लॉग और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हजारों साहित्यिक मंच संचालित हो रहे हैं। इनसे देश-विदेश के लाखों साहित्यकार जुड़े हुए हैं। इनमें नवोदित और स्थापित दोनों तरह के रचनाकार शामिल हैं।

इन डिजिटल मंचों ने युवा साहित्यकारों को अपनी रचनाएं व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाने का अवसर दिया है। वे अपनी कविताएं, कहानियां, लेख और अन्य साहित्यिक रचनाएं देश-विदेश के पाठकों एवं साहित्यकारों के साथ साझा कर रहे हैं। इससे हिन्दी साहित्य के विस्तार के साथ-साथ हिन्दी भाषा को भी नया पाठक वर्ग मिल रहा है।

वेब मैगजीन, ई-बुक्स और सोशल मीडिया ने युवा रचनाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के लिए ऐसा मंच उपलब्ध कराया है, जो पहले सीमित लोगों को ही हासिल था।

उच्च शिक्षा में हिन्दी माध्यम की चुनौती

हिन्दी के विकास की राह में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक उच्च शिक्षा में हिन्दी माध्यम की सीमित उपलब्धता है। इंटरमीडिएट के बाद अधिकांश विद्यार्थी बीएससी, बीसीए, बीबीए, बीटेक, आईआईटी, एमबीबीएस जैसे व्यावसायिक और तकनीकी पाठ्यक्रमों की ओर बढ़ते हैं। इन पाठ्यक्रमों में अधिकांश अध्ययन सामग्री अंग्रेजी में उपलब्ध है।

यह स्थिति हिन्दी के प्रति विद्यार्थियों की रुचि को प्रभावित करती है। यदि इन पाठ्यक्रमों की उच्च गुणवत्ता वाली पुस्तकें और अध्ययन सामग्री हिन्दी में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों तो हिन्दी की स्वीकार्यता और उपयोगिता में निश्चित रूप से वृद्धि हो सकती है।

हिन्दी को रोजगार की भाषा बनाना जरूरी

हिन्दी के प्रचार-प्रसार और देश में हिन्दी बोलने वालों की संख्या बढ़ाने के लिए हिन्दी को रोजगार की भाषा बनाना आवश्यक है। सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अवसर सीमित हैं, जबकि निजी क्षेत्र और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में युवाओं के लिए रोजगार की बड़ी संभावनाएं हैं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों में अंग्रेजी का अधिक प्रयोग होने के कारण युवा अंग्रेजी को रोजगार के लिहाज से प्राथमिकता देते हैं। अधिकांश प्रतियोगी परीक्षाओं, उच्च शिक्षा, कॉरपोरेट क्षेत्र और सरकारी कामकाज में अंग्रेजी के व्यापक प्रयोग ने भी इसकी स्थिति मजबूत की है।

न्यायपालिका में अंग्रेजी के व्यापक इस्तेमाल का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। आम आदमी के लिए न्याय तभी अधिक सहज हो सकता है, जब वह न्यायिक प्रक्रिया और फैसलों को अपनी भाषा में आसानी से समझ सके।

मातृभाषा में शिक्षा से बढ़ेगी समझ

अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाना आज समाज में एक तरह का स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है। इसके कारण अनेक विद्यालयों में अंग्रेजी शिक्षा का प्रमुख माध्यम बनी हुई है।

मातृभाषा में पढ़ाई से विद्यार्थी विषयों को अधिक सहजता से समझ सकते हैं। मातृभाषा में शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने कहा था कि “सर्वसाधारण की उन्नति मातृभाषा के द्वारा ही हो सकती है।”

महान वैज्ञानिक सी.वी. रमन ने भी मातृभाषा के माध्यम से विज्ञान शिक्षा के महत्व पर बल दिया था।

नई शिक्षा नीति-2020 में विद्यालयी शिक्षा में मातृभाषा और भारतीय भाषाओं के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया है। यदि इसका प्रभावी क्रियान्वयन होता है तो हिन्दी सहित देश की अन्य भारतीय भाषाओं को भी मजबूती मिल सकती है।

मीडिया ने हिन्दी को दिया रोजगार का अवसर

हिन्दी के प्रचार-प्रसार और हिन्दी में दक्ष युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। देश में बड़ी संख्या में हिन्दी समाचार पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं और हिन्दी समाचार चैनलों की भी व्यापक पहुंच है। डिजिटल मीडिया और यूट्यूब ने इस क्षेत्र का विस्तार और अधिक बढ़ा दिया है।

मीडिया में हिन्दी का प्रभावी ज्ञान रखने वाले युवाओं के लिए संवाददाता, पत्रकार, सह-संपादक, संपादक, एंकर, कंटेंट राइटर और अन्य भूमिकाओं में रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं। डिजिटल मीडिया के विस्तार ने हिन्दी कंटेंट की मांग को भी बढ़ाया है।

प्रसार भारती के आकाशवाणी और दूरदर्शन केंद्रों ने भी हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से हिन्दी कार्यक्रम देश के दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचे हैं।

आम आदमी को अपनी भाषा में मिले न्याय

देश की न्याय व्यवस्था में भाषा का प्रश्न आज भी गंभीर विषय है। आम आदमी वर्षों तक न्यायालयों के चक्कर काटता है, अपनी मेहनत की कमाई खर्च करता है और जब फैसला आता है तो कई बार उसे ऐसा दस्तावेज मिलता है जिसे वह स्वयं पढ़ और समझ नहीं पाता।

न्याय का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब आम नागरिक को न्यायिक प्रक्रिया और फैसले अपनी समझ की भाषा में उपलब्ध हों। न्यायालयों में भारतीय भाषाओं के उपयोग को बढ़ावा देने से हिन्दी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं को भी मजबूती मिल सकती है।

हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल

निश्चित रूप से वर्तमान समय में हिन्दी की लोकप्रियता और स्वीकार्यता बढ़ी है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, सिनेमा, साहित्य और मीडिया ने हिन्दी को वैश्विक मंच पर नई पहचान दी है। लेकिन हिन्दी को और मजबूत बनाने के लिए उसे शिक्षा, रोजगार, तकनीक और न्याय से प्रभावी रूप से जोड़ना होगा।

नई शिक्षा नीति के प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन, उच्च शिक्षा में हिन्दी की गुणवत्तापूर्ण सामग्री की उपलब्धता और रोजगार के अवसरों में हिन्दी के बढ़ते उपयोग से भाषा को नई ताकत मिल सकती है।

हिन्दी का भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल है। यदि हिन्दी के प्रति बढ़ती वैश्विक रुचि इसी गति से आगे बढ़ती रही और उसे शिक्षा एवं रोजगार का मजबूत आधार मिला, तो आने वाले वर्षों में हिन्दी का वैश्विक प्रभाव और अधिक व्यापक होने की पूरी संभावना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!