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ओजोन परत के संरक्षण को लेकर साहित्य परिषद ने किया मंथन

ओजोन परत के संरक्षण को लेकर साहित्य परिषद ने किया मंथन

वक्ताओं ने कहा—बढ़ते तापमान से पिघल रहे ग्लेशियर, प्रकृति से छेड़छाड़ मानवता के लिए खतरा

बरेली। विश्व ओजोन दिवस के अवसर पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद, ब्रज प्रांत बरेली के तत्वावधान में प्रभात नगर स्थित कार्यालय पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम का आयोजन जनपदीय अध्यक्ष डॉ. ब्रजेश कुमार शर्मा ने किया। गोष्ठी के मुख्य अतिथि प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. सुरेश बाबू मिश्रा रहे, जबकि अध्यक्षता प्रांतीय उपाध्यक्ष डॉ. एसपी मौर्य ने की।

कार्यक्रम का शुभारंभ जनपदीय उपाध्यक्ष मोहन चंद्र पाण्डेय द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ। गोष्ठी को संबोधित करते हुए प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. सुरेश बाबू मिश्रा ने कहा कि ओजोन परत वायुमंडल की महत्वपूर्ण परत है, जो सूर्य की पराबैंगनी किरणों के एक बड़े हिस्से को अवशोषित करती है। उन्होंने इसे पृथ्वी की सुरक्षा छतरी बताते हुए इसके संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि रेफ्रिजरेटर और एसी से निकलने वाली फ्लोरो-क्लोरो कार्बन गैसों के कारण ओजोन परत को नुकसान पहुंच रहा है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है और ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रकृति के साथ इसी तरह छेड़छाड़ जारी रही तो मानवता के अस्तित्व के सामने गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

जनपदीय अध्यक्ष डॉ. ब्रजेश कुमार शर्मा, प्रांतीय संयुक्त महामंत्री निरुपमा अग्रवाल, प्रांतीय संचार मंत्री डॉ. अखिलेश कुमार गुप्ता, विमलेश चंद्र दीक्षित और प्रोफेसर विनीता सिंह ने भी ओजोन परत के संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा पर अपने विचार रखे।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. एसपी मौर्य ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के लिए एसी और रेफ्रिजरेटर के उपयोग को नियंत्रित करने के प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने अधिक से अधिक वृक्षारोपण करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

कार्यक्रम का संचालन प्रांतीय संयुक्त महामंत्री निरुपमा अग्रवाल ने किया। इस दौरान गंगाराम पाल, विमलेश चंद्र दीक्षित, कुलदीप वर्मा, अनिल शर्मा, प्रमोद मिश्रा, संजीव शंखधार, गुरविंदर सिंह, महेंद्र पाल राही, रितेश साहनी और अंशुमान सिसोदिया सहित परिषद के पदाधिकारी एवं सदस्य मौजूद रहे। अंत में जनपदीय मंत्री विमलेश चंद्र दीक्षित ने सभी का आभार व्यक्त किया।

नोट: मूल प्रति में तापमान वृद्धि और नेपाल की बाढ़ से जुड़े कुछ दावे वैज्ञानिक रूप से संदिग्ध/असत्यापित हैं, इसलिए उन्हें समाचार कॉपी में तथ्य के रूप में विस्तार से नहीं दोहराया गया है।

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