वंदे मातरम् गाने को लेकर हाल ही में सियासी तनातनी काफी बढ़ गई है। केंद्र सरकार (गृह मंत्रालय) ने 28 जनवरी 2026 को नए दिशा-निर्देश जारी किए, जिसमें राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के पूरे 6 छंद (लगभग 3 मिनट 10 सेकंड वाले संस्करण) को सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों-कॉलेजों, तिरंगा फहराने, राष्ट्रपति/राज्यपाल के आगमन आदि मौकों पर अनिवार्य कर दिया गया है। अगर ‘जन गण मन’ के साथ बजाया जाए तो पहले ‘वंदे मातरम’ बजाना होगा, और सुनने वालों को खड़े होकर सम्मान देना अनिवार्य है।
यह फैसला ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने के समारोहों के बीच आया, जिससे राजनीतिक बहस छिड़ गई।देश के राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्‘ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संसद के दोनों सदनों में विशेष चर्चा शुरू होने के साथ ही, यह मुद्दा एक बार फिर देश की राजनीति में गरमाहट पैदा कर चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में चर्चा की शुरुआत करते हुए जहाँ इस गीत के ऐतिहासिक गौरव को पुनःस्थापित करने की बात कही, वहीं कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे विपक्षी दलों ने बीजेपी पर इसे जबरन थोपने और राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है।
विवाद के मुख्य कारण और पक्ष
- समर्थकों का पक्ष (मुख्यतः BJP और NDA): इसे राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि विरोध करने वालों को “कान पकड़कर बाहर कर देना चाहिए” और ऐसे लोगों का भारत में रहने का कोई हक नहीं। बीजेपी नेता इसे कांग्रेस और नेहरू युग की “तोड़-मरोड़” के खिलाफ सुधार बताते हैं।
- विरोधियों का पक्ष (मुस्लिम संगठन, कांग्रेस, TMC, Left):
- ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) और जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता (संविधान के अनुच्छेद 25) पर हमला बताया और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही।
- मौलाना अरशद मदनी जैसे नेताओं ने कहा कि यह इस्लामिक मान्यताओं के खिलाफ है (क्योंकि कुछ छंदों में मातृभूमि को देवी रूप में देखा जाता है, जो एकेश्वरवाद से टकराता है)।
- TMC ने इसे टैगोर के ‘जन गण मन’ पर “अपमान” बताया। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक पॉइंट स्कोरिंग और विभाजनकारी बताया। बेंगलुरु के चीफ इमाम और अन्य ने भी आपत्ति जताई।
कुछ प्रमुख घटनाएं
- मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सभी संस्थानों में 6 छंद अनिवार्य किए, कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने विरोध किया।
- संसद और विधानसभाओं में बहस हुई, BJP vs Opposition में तीखी नोकझोंक।
- विपक्ष का आरोप: यह अनिवार्यता से “अपील” की बजाय “दबाव” है, जबकि समर्थक इसे “पूर्ण सम्मान” देने का कदम बताते हैं।
यह मुद्दा पुराना है (स्वतंत्रता आंदोलन में भी कुछ मुस्लिम नेताओं ने पहले आपत्ति जताई थी), लेकिन 2026 में नए गाइडलाइंस से फिर गरमा गया। कई जगहों पर इसे “राष्ट्रवाद vs धार्मिक स्वतंत्रता” का टकराव बताया जा रहा है।










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