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देशहित में दान कर दीं खून, चर्बियां, हड्डियां…

bareillylive:bareillynews:एसआरएमएस रिद्धिमा में कवि सम्मेलन ‘साहित्य सरिता’ का आयो

बरेली। एसआरएमएस रिद्धिमा में गुरुवार शाम आयोजित कवि सम्मेलन ‘साहित्य सरिता’ में वीर रस, श्रृंगार, हास्य-व्यंग्य, सामाजिक सरोकार और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत रचनाओं ने श्रोताओं को देर तक बांधे रखा। कवियों ने अपनी प्रभावशाली प्रस्तुतियों से कभी तालियां बटोरीं तो कभी श्रोताओं को भावुक कर दिया। कवि उमेश त्रिगुणायत ‘अद्भुत’ की पंक्तियां “देशहित में दान कर दीं खून, चर्बियां, हड्डियां…” पूरे आयोजन का आकर्षण रहीं।

कवि सम्मेलन का शुभारंभ कवयित्री आकांक्षा गुप्ता (हरदोई) ने वाणी वंदना से किया। उन्होंने अपनी रचना “प्रेम ग्रंथों में कथाओं में पढ़ा, वेद मंत्रों में ऋचाओं में पढ़ा, लोकहित में कभी खुली थीं जो, तुमको उन शिव की जटाओं में पढ़ा” सुनाकर सनातन संस्कृति की महिमा का भावपूर्ण चित्रण किया।

गीतकार विकास आर्य ‘स्वप्न’ (पूरनपुर) ने श्रमिक वर्ग की पीड़ा को स्वर देते हुए सुनाया, “मेहनत करता रहता है, ज्यादा आराम नहीं मिलता, मेहनत पूरी होती है और पूरा दाम नहीं मिलता। जिसके घर का चूल्हा बस मजदूरी से जलता हो, उस दिन क्या होता है जिस दिन काम नहीं मिलता।” उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया।

हास्य-व्यंग्य कवि पीके ‘दीवाना’ (बरेली) ने वैवाहिक जीवन पर आधारित अपनी व्यंग्य रचनाओं से सभागार को ठहाकों से गूंजा दिया। उन्होंने कहा, पत्नी चाहे तो पारिवारिक विषम परिस्थितियों में भी अपने को ढाल सकती है और यदि अपने पर आ जाए तो किसी तरह से भी भड़ास निकाल सकती है।” इसके बाद पति-पत्नी के संवाद पर आधारित उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को खूब हंसाया।

कवि अभिषेक अनंत (बदायूं) ने अपनी भावपूर्ण प्रेम रचना “मैं गया हार तुम जीत बनकर रहीं, जिंदगी भर अमर प्रीत बनकर रहीं, गुनगुनाता रहा मैं सफर भर तुम्हें, तुम हृदय में मेरे गीत बनकर रहीं” सुनाकर श्रोताओं को भावनाओं के संसार में पहुंचा दिया।

कवि उमेश त्रिगुणायत ‘अद्भुत’ (बरेली) ने अपनी ओजपूर्ण रचना “मजहबों के नाम पर बांटा हुआ हूं दोस्तों, इस जहां में बेसबब डांटा हुआ हूं दोस्तों, देशहित में दान कर दीं खून, चर्बियां, हड्डियां, इसलिए मैं सूखकर कांटा हूं दोस्तों” सुनाकर देशभक्ति और सामाजिक चेतना का प्रभावशाली संदेश दिया। उनकी प्रस्तुति पर सभागार देर तक तालियों से गूंजता रहा।

कवि हिमांशु श्रोत्रिय ‘निष्पक्ष’ (बरेली) ने समकालीन परिस्थितियों पर तीखा प्रहार करते हुए अपनी कविता अधुनातन हो गए लोग जब, जड़ें स्वयं की काट रहे हों… फिर कैसे संभव है कह दें, विजय हमारी ही बस होगी” सुनाकर खूब वाहवाही लूटी।

कार्यक्रम में डॉ. प्रभाकर गुप्ता, डॉ. अनुज गुप्ता, डॉ. शैलेश सक्सेना तथा ‘साहित्य सरिता’ के समन्वयक अश्वनी कुमार चौहान सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का प्रभावी संचालन कवि उमेश त्रिगुणायत ‘अद्भुत’ ने किया। अंत में आयोजकों ने सभी कवियों एवं अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए साहित्यिक गतिविधियों को निरंतर आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया।

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