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साहित्य में नए कीर्तिमान गढ़ रहे हैं साहित्यभूषण पुरूस्कार प्राप्त लोकतंत्र सेनानी सुरेश बाबू मिश्रा

Bareillylive : साहित्यभूषण से सम्मानित और लोकतंत्र सेनानी के रूप में चर्चित सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य सुरेश बाबू मिश्रा ने साहित्य क्षेत्र में वर्षों से लगातार सक्रिय योगदान दिया है। उनके कथा-साहित्य और लघुकथाएँ देश की प्रमुख पत्रिकाओं व समाचार-पत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहती हैं। उन्हें साहित्यिक गतिविधियों और समाजसेवा के लिए कई राज्य तथा राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।

साहित्यिक यात्रा और प्रकाशन
सूरज जैसे लेखन-प्रवाह वाले सुरेश बाबू मिश्रा की लेखनी की शुरुआत सन् 1984 में हुई थी, जब उनकी पहली कहानी ‘सुख का महल’ पंजाब केसरी के कहानी संस्करण में प्रकाशित हुई और साहित्यिक जगत में उनकी पहचान बने। उनके संग्रहों में ‘सहमा हुआ शहर’, ‘लहू का रंग’, ‘थरथराती लौ’, ‘बलिदान की कहानियाँ’, ‘कैक्टस के जंगल’ सहित अनेक शीर्षक शामिल हैं। कुल मिलाकर उनकी रचनाएँ 100 से अधिक कहानियाँ, 200 लघुकथाएँ और 250 से अधिक लेखों के रूप में प्रकाशित हो चुके हैं। कुछ कृतियों का अंग्रेजी और मराठी में अनुवाद भी हुआ है।

शैक्षिक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि
सुरेश बाबू मिश्रा का जन्म 5 जुलाई 1956 को उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के चन्दोखा गाँव में हुआ। शिक्षा-क्षेत्र में उन्होंने लंबी सेवा दी और 29 सितम्बर 1980 को उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग में जोइन करने के बाद 37 वर्षों तक विभिन्न पदों पर रहते हुए दायित्वों का निर्वहन किया। सन् 2017 में वे राजकीय इंटर कॉलेज, बरेली के प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने बी.ए., एम.ए. (भूगोल और बाद में अंग्रेज़ी में), तथा बी.Ed. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं।

सांस्कृतिक प्रसारण और मीडिया सहभागिता
सुरेश बाबू की कहानियाँ व नाटक आकाशवाणी रामपुर व बरेली से प्रसारित होते रहे हैं। वे पंजाब केसरी और राष्ट्रीय सहारा के नियमित लेखक रहे हैं। कनाडा से प्रकाशित मासिक साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्य कुंज’ तथा अंतर्राष्ट्रीय वेब मैगज़ीन ‘व्यंजना’ में उनकी रचनाएँ छपती रही हैं। इसके अलावा कई वार्ताएँ, परिचर्चाएँ और साक्षात्कार बरेली दूरदर्शन केंद्र पर भी प्रसारित होते रहे हैं।

सम्मान और पुरस्कार
साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिये उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘साहित्य भूषण सम्मान-2018’, केन्द्रीय सचिवालय हिन्दी परिषद का ‘शब्द शिरोमणि सम्मान-2021’, मीर तकी मीर सम्मान-2019, अखिल भारतीय निर्मल वर्मा संस्मरण सम्मान-2024, और प्रताप नारायण मिश्र सम्मान-2025 शामिल हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें अनेक संस्थाओं द्वारा कथा- व लघुकथा प्रतियोगिताओं व विभिन्न साहित्यिक संगठनों से सम्मानित किया जा चुका है।

सामाजिक कार्य और वर्तमान स्थिति
वर्तमान में सेवानिवृत्ति के बाद भी वे साहित्य सृजन के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं। वे अखिल भारतीय साहित्य परिषद के प्रांतीय अध्यक्ष, संकल्प सामाजिक एवं साहित्यिक संस्था के अध्यक्ष, भारतीय लोकतंत्र रक्षक सेनानी कल्याण समिति के मण्डल अध्यक्ष तथा राजकीय शिक्षक संघ के प्रान्तीय संरक्षक रह चुके हैं। स्वर संगम शिक्षा चैरिटेबल ट्रस्ट के संरक्षक के रूप में भी वे समाज में शिक्षा व देशभक्ति को प्रोत्साहित कर रहे हैं।

साहित्य में दीर्घकालीन सेवा और सामाजिक प्रतिबद्धता के चलते सुरेश बाबू मिश्रा का व्यक्तित्व न केवल साहित्यिक पाठकवृंदी में बल्कि समाजसेवा और शैक्षिक क्षेत्र में भी सम्मानजनक स्थान रखता है। उनकी सक्रियता और लेखनी आगे भी साहित्य जगत को समृद्ध करती रहेगी।

साभार : निर्भय सक्सेना

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