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रमा एकादशी व्रत : जानें व्रत-पूजन का मुहूर्त और विधि-विधान

rama-ekadashiनई दिल्ली, 6 नवम्बर। हिंदू धर्म में एकादशी के व्रत की काफी महत्ता है। हर साल 24 एकादशियां होती हैं। इसमें से कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम रमा एकादशी है। कहते हैं कि यह बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली एकादशी है। इस एकादशी का नाम लक्ष्मी जी के नाम पर होने के कारण इसे रमा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस बार यह एकादशी 7 नवंबर शनिवार को है। यह एकादशी दीपावली के चार दिन पहले पड़ती है।

रमा एकादशी का प्रभाव अन्य दूसरी एकादशी से अधिक होता है। माना जाता है कि इस व्रत को रखने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यहां तक कि इस व्रत के प्रभाव से ब्रह्महत्या जैसे पाप भी खत्म हो जाते हैं। रमा एकादशी का व्रत सुहागिनों के लिए सौभाग्य और सुख लेकर आता है।

इसके अगले दिन यानी 8 नवंबर रविवार को रमा एकादशी का व्रत विधि-विधान के साथ तोड़ना (पारण) चाहिए। इस दिन भगवान श्री कृष्ण को मिश्री और मान का भोग लगाएं। इसके लिए रविवार के दिन ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें आदर के साथ भोजन करा कर। दान-दक्षिणा देकर सम्मान के साथ विदा करें।

रमा एकादशी पूजा मुहूर्त का सही समय
एकादशी तिथि शुरुआत की तारीख 6 नवंबर 2015
एकादशी तिथि के खत्म होने की तारीख 7 नवंबर 2015
रविवार 8 नवंबर को पारण का समय सुबह 05:48 से 08:01 बजे तक
8 नवंबर पारन को द्वादशी खत्म होने का समय शाम 04:31 बजे

रमा एकादशी व्रत की कथा
प्राचीन समय में मुचुकुंद नाम के एक राजा थे जिनकी मित्रता देवराज इंद्र, यम, वरुण, कुबेर एवं विभीषण से थी। वह बड़े धार्मिक प्रवृति वाले व सत्यप्रतिज्ञ थे। उनके राज्य में सभी सुखी थे। उनकी चंद्रभागा नाम की एक पुत्री थी, जिसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ था।

एक दिन शोभन अपने श्वसुर के घर आया तो संयोगवश उस दिन एकादशी थी। शोभन ने एकादशी का व्रत करने का निश्चय किया। चंद्रभागा को यह चिंता हुई कि उसका पति भूख कैसे सहन करेगा? इस विषय में उसके पिता के आदेश बहुत सख्त थे। राज्य में सभी एकादशी का व्रत रखते थे और कोई अन्न का सेवन नहीं करता था। शोभन ने अपनी पत्नी से कोई ऐसा उपाय जानना चाहा, जिससे उसका व्रत भी पूर्ण हो जाए और उसे कोई कष्ट भी न हो, लेकिन चंद्रभागा उसे ऐसा कोई उपाय न सूझा सकी।

निरूपाय होकर शोभन ने स्वयं को भाग्य के भरोसे छोड़कर व्रत रख लिया। लेकिन वह भूख, प्यास सहन न कर सका और उसकी मृत्यु हो गई। इससे चंद्रभागा बहुत दुखी हुई। पिता के विरोध के कारण वह सती नहीं हुई।

उधर, शोभन ने रमा एकादशी व्रत के प्रभाव से मंदराचल पर्वत के शिखर पर एक उत्तम देवनगर प्राप्त किया। वहां ऐश्वर्य के समस्त साधन उपलब्ध थे। गंधर्वगण उसकी स्तुति करते थे और अप्सराएं उसकी सेवा में लगी रहती थीं। एक दिन जब राजा मुचुकुंद मंदराचल पर्वत पर आए तो उन्होंने अपने दामाद का वैभव देखा। वापस अपनी नगरी आकर उसने चंद्रभागा को पूरा हाल सुनाया तो वह अत्यंत प्रसन्न हुई। वह अपने पति के पास चली गई और अपनी भक्ति और रमा एकादशी के प्रभाव से शोभन के साथ सुखपूर्वक रहने लगी।

जीन्यूज.काम से साभार
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