त्रिपुरा के एक छोटे से गांव की 23 वर्षीय बेटी अस्मिता डे ने शुक्रवार को, इतिहास रच दिया। कॉमनवेल्थ गेम्स में महिलाओं के 48 किग्रा वर्ग में गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय बन गईं। लेकिन जिस शख्स को वह सबसे पहले यह खुशखबरी देना चाहती थीं, वह आज इस दुनिया में नहीं है।
ग्लासगो में पदक जीतने के बाद भारतीय एथलीट अस्मिता डे भावुक हो गईं। उन्होंने अपनी इस उपलब्धि को अपने कोच और दिसंबर 2025 में दिवंगत हुए अपने पिता को समर्पित किया।
त्रिपुरा के बेलोनिया की रहने वाली अस्मिता डे ने कभी नहीं सोचा था कि वह एक दिन भारत के लिए इतिहास रचेंगी। उनका बचपन पिता अर्जुन कुमार डे की छोटी-सी साइकिल मरम्मत की दुकान और सीमित संसाधनों के बीच बीता।
सिर्फ़ ₹300 रोज़ कमाने वाले एक साइकिल मैकेनिक पिता… जिन्होंने मिट्टी के घर में रहकर भी अपनी बेटी के सपनों को कभी छोटा नहीं होने दिया। सात महीने पहले उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी सीख और विश्वास आज भी अस्मिता की सबसे बड़ी ताकत है।
आज गले में पड़ा यह गोल्ड मेडल सिर्फ़ अस्मिता का नहीं, उस हर पिता का है जो अपनी औलाद के सपनों के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी खपा देता है।
शुरुआत में अस्मिता 800 मीटर दौड़ की एथलीट थीं। जिला स्तर तक दौड़ में अपनी पहचान बना चुकी थीं। लेकिन एक कोच की सलाह ने उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी। उन्होंने जूडो को अपनाया… और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
कोच बीना देवनाथ, माणिक लाल देव और बाद में SAI भोपाल में यशपाल सोलंकी के मार्गदर्शन में अस्मिता ने अपनी प्रतिभा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उन्होंने जूनियर एशिया कप, अफ्रीकन ओपन, एशियन ओपन और कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन कर धीरे-धीरे भारतीय जूडो की नई उम्मीद बनकर उभरीं।










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