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शहीद ऐ आज़म सरदार भगत सिंह जी की ११० वीं जयंती पर कुछ विशेष …

“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है।”शहीद-ए-आज़म भगत सिंह जी की जयंती पर उन्हें शत्-शत् नमन।

नई दिल्ली। आज अमर शहीद भगत सिंह की 110वीं जयंती है। ये तो सब जानते हैं कि भगत सिंह ने 24 साल की छोटी सी उम्र में इंकलाब का नारा बुलंद करते हुए ब्रिटिश हुकूमत की नाक में दम कर दिया था। लेकिन इस बात को बेहद कम लोग जानते हैं कि भगत सिंह ने दिल्ली की ब्रिटिश असेंबली में जो बम फोड़ा था, वो आगरा में बनाया गया था। भगत सिंह का जन्म 28सितम्बर 1907 को एक जाट सिक्ख परिवार में ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के लायलपुर जिले में बंगा गांव में किशन सिंह और विद्यावती के घर में हुआ था।

अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। हालांकि इस समय भगत सिंह की उम्र केवल 12 साल थी। इस हत्याकांड की खबर मिलते हीं वे अपने स्कूल से 12 मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गए थे, वे 14 वर्ष की आयु से ही क्रान्तिकारी समूहों से जुड़ने लगे। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की। काकोरी काण्ड में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ सहित 4 क्रान्तिकारियों को फाँसी व 16 को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक आक्रोशित हो गए कि वो चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड गये और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशनभगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसम्बर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जेपी सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने वर्तमान नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार संसद भवन में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी। भगत सिंह ने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें 23 मार्च 1931 को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया।
जानकारी के लिए आपको बता दें कि दरअसल, जिन्‍हें हम शहीद-ए-आजम कहते हैं वह भारत सरकार के रिकॉर्ड में शहीद ही नहीं हैं। भगत सिंह को अब भी किताबों में ‘क्रांतिकारी आतंकी’ कहा जा रहा है। इस बात का खुलासा अप्रैल 2013 में एक आरटीआई के जवाब से हुआ था। तब से भगत सिंह के वंशज भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को सरकारी रिकॉर्ड में शहीद घोषित करवाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

“अहिंसा को आत्म-बल के सिद्धांत का समर्थन प्राप्त है जिसमे अंतत: प्रतिद्वंदी पर जीत की आशा में कष्ट सहा जाता है।लेकिन तब क्या हो जब ये प्रयास अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो जाएं ? तभी हमें आत्म -बल को शारीरिक बल से जोड़ने की ज़रुरत पड़ती है ताकि हम अत्याचारी और क्रूर दुश्मन के रहमोकरम पर ना निर्भर करें .”– शहीद ऐ आज़म सरदार भगत सिंह जी

इंक़लाब जिंदाबाद ।।

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