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माँ शीतला का स्वरूप और महिमा,शीतला स्तोत्र

हिन्दू धर्म में माँ शीतला को आरोग्य प्रदान करने वाली देवी मानी जाती हैं। “शीतला” शब्द का अर्थ है शीतलता देने वाली, अर्थात् जो शरीर और मन के ताप को शांत करती हैं। लोक परंपरा में इन्हें विशेष रूप से चेचक, ज्वर तथा संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार माँ शीतला आदि शक्ति का ही एक करुणामयी रूप हैं। वे संसार के रोग-दोष को अपने अधीन रखकर भक्तों को स्वास्थ्य और शांति प्रदान करती हैं। उनके हाथ में झाड़ू, कलश, सूप (पंखा) और नीम की पत्तियाँ होती हैं, जो रोगों को दूर करने और शुद्धता का प्रतीक माने जाते हैं। उनका वाहन गधा है और वे सामान्यतः कमल पर विराजमान दिखाई देती हैं।

पुराणों में उल्लेख:माँ शीतला का उल्लेख कई ग्रंथों में मिलता है। विशेष रूप सेस्कन्द पुराण, भविष्य पुराण तथा लोक परंपराओं में प्रचलित शीतला महात्म्य में इनकी महिमा का वर्णन मिलता है।

इन ग्रंथों के अनुसार देवी शीतला रोगों की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। जब मनुष्य धर्म और शुद्धता से दूर होता है तो रोग उत्पन्न होते हैं, और देवी की कृपा से वही रोग शांत भी हो जाते हैं। इसलिए ग्रामीण भारत में आज भी शीतला माता की पूजा अत्यंत श्रद्धा से की जाती है।

माँ शीतला की साधना कौन करता है:माँ शीतला की साधना सामान्य भक्तों के साथ-साथ कई साधक और तांत्रिक भी करते हैं।ग्राम देवता परंपरा में रोग निवारण के लिए परिवार और गाँव के लोग मिलकर उनकी पूजा करते हैं। तांत्रिक साधनाओं में भी शीतला माता को रोगों और नकारात्मक शक्तियों को शांत करने वाली शक्ति के रूप में माना जाता है।चैत्र और वैशाख मास में आने वाली शीतला अष्टमी तथा बसोड़ा के दिन विशेष रूप से उनकी पूजा की जाती है।

शीतला स्तोत्र

प्रचलित स्तुति इस प्रकार है —

शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम् ।

मार्जनी-कलशोपेतां शूर्पालंकृत-मस्तकाम् ॥

नमामि शीतलां देवीं सर्वरोगभयापहाम् ।

यामासाद्य निवर्तन्ते विस्फोटकभयं महत् ॥

अर्थ —

मैं उस देवी शीतला को प्रणाम करता हूँ जो गधे पर विराजमान हैं, हाथ में झाड़ू और कलश धारण करती हैं और जो सभी रोगों तथा भय को दूर करने वाली हैं। जिनकी शरण में जाने से बड़े से बड़ा रोग भी शांत हो जाता है।

भक्तों की मान्यता है कि माँ शीतला की उपासना से

शरीर के रोग शांत होते हैं,

घर में स्वास्थ्य और शांति बनी रहती है,

और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

माता की साधना सदैव शुद्धता, संयम और श्रद्धा के साथ करनी चाहिए। उनकी कृपा से जीवन में शांति और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

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