The Voice of Bareilly since 2010

बेहमाता “षष्ठी माता” – जो लिखती हैं शिशु का भाग्य

सनातन परंपरा में लोकमान्यता और पुराणों के अनुसार एक अत्यंत रहस्यमयी देवी का वर्णन मिलता है जिन्हें बेहमाता, षष्ठी माता या छठी माता कहा जाता है। माना जाता है कि जब किसी बालक का जन्म होता है तो जन्म के छठे दिन अर्थात षष्ठी तिथि को यह देवी अदृश्य रूप से आकर उस बालक के जीवन का भाग्य लिखती हैं। इसी कारण भारत के अनेक क्षेत्रों में जन्म के छठे दिन “छठी” या “षष्ठी उत्सव” मनाया जाता है और इस अवसर पर लोकगीत गाकर माता का स्मरण किया जाता है।

पुराणों में षष्ठी देवी को संतान की रक्षा करने वाली मातृशक्ति माना गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड में षष्ठी देवी का उल्लेख मिलता है जहाँ उन्हें भगवान कार्तिकेय की पत्नी देवसेना का स्वरूप बताया गया है। वे बालकों की रक्षा करने वाली और वंशवृद्धि प्रदान करने वाली देवी मानी जाती हैं।

एक प्राचीन स्तुति में कहा गया है:षष्ठी देवि नमस्तुभ्यं बालानां रक्षणप्रिये।सौभाग्यं देहि मे नित्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धिनि॥

अर्थ यह है कि हे षष्ठी देवी, आपको नमस्कार है। आप बालकों की रक्षा करने वाली हैं। कृपया सौभाग्य और संतान की वृद्धि प्रदान करें।

लोकपरंपरा में यह भी माना जाता है कि छठे दिन रात्रि में बेहमाता घर में आती हैं और शिशु के भविष्य का लेखन करती हैं। इसलिए उस दिन दीप जलाकर, कलम-दवात रखकर और प्रसाद अर्पित करके देवी का स्वागत किया जाता है। कई क्षेत्रों में बिल्ली को षष्ठी माता का वाहन माना जाता है और उसे भोजन कराना शुभ समझा जाता है।

षष्ठी माता को प्रकृति की उस शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है जो जीवात्मा के कर्मों के अनुसार जीवन का प्रारब्ध निर्धारित करती है। इसलिए छठे दिन भाग्य लेखन की परंपरा वास्तव में कर्म और प्रारब्ध के सिद्धांत का प्रतीक मानी जाती है। इस प्रकार बेहमाता केवल लोकविश्वास की देवी नहीं अपितु संतान की रक्षा, आयु और भाग्य की अधिष्ठात्री आदिशक्ति के रूप में पूजित हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!