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कथाओं के शब्दों को ग्रहण न करें, उसके सार को ग्रहण करें….श्री श्वेताभ जी महाराज

प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज ने इन दिनों भागवतम् की कथाओं के पीछे के रहस्यों को उजागर किया है।उनका कहना है कि हर धार्मिक प्रक्रिया के पीछे के रहस्यों को समझना आवश्यक है तब ही उसका लाभ प्राप्त हो सकता है।

जैसे गंगा का उदाहरण देते हुए महाराज जी ने बताया कि यदि गंगा में नहाने से मुक्ति मिल जाती तो आज घर घर में गंगाजल है और गंगा नदी में मौजूद सभी जीवों को मुक्ति मिल चुकी होती।
उन्होंने गंगा का वास्तविक अर्थ भगवद ज्ञान का प्रवाह बताया अर्थात यदि व्यक्ति गुरु के द्वारा बताए भगवद ज्ञान में डुबकी लगा ले तो उसे भव बंधन से मुक्ति मिल जाती है। किंतु अधिकतर मनुष्य सिर्फ गंगा नदी में नहा लेने को ही मुक्ति का मार्ग बता देते हैं जबकि ये सिर्फ प्रतीक मात्र है। मुख्य है गंगा के किनारे बैठे संतों से भगवद तत्व जान लेना।

इसी तरह आज के युग में होते हुए पाखंड पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान इंद्रियों द्वारा कभी प्राप्त नहीं किए जा सकते। भगवान सिर्फ मन से भक्ति करने पर प्राप्त होते हैं। बाकी इंद्रियों को कोई भी कार्य बस सहायक तत्व है, मुख्य है “मन से भगवान का स्मरण”

महाराज जी ने जप का अर्थ बताते हुए कहा कि ज का अर्थ जन्म लेना और प का अर्थ प्रतिष्ठित करना अर्थात भगवान को अपने मन में प्रतिष्ठित करना। अर्थात मन द्वारा भगवान का स्मरण। सिर्फ राम राम या राधा राधा कहने से भगवान नहीं मिलेंगे बल्कि मन से भगवान का स्मरण करना होगा। उसी संबंध में वेदों , उपनिषदों के अनेक उदाहरण दिए जिसमें “मन के स्मरण को मुख्य बताया है”।

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