श्री गोपाल स्तुति – श्रीमद्भागवत के द्वितीय स्कन्ध से ली गयी है और स्वयं ब्रह्मा जी ने बाल गोपाल की स्तुति के रूप में गायी है। जब श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा जी का मोह भंग करने के लिए अपने समस्त ग्वाल-बालों को विष्णु-रूप में दिखाया, तब ब्रह्मा जी ने रो-रो कर यह स्तुति की।
फल:
इस स्तुति का पाठ करने से घर में बाल-कृष्ण की साक्षात् उपस्थिति होती है। संतान-सुख, घर की कलह शांति और मन की निश्छलता के लिए इसका नित्य प्रातः पाठ अचूक माना गया है।
श्री गोपाल स्तुति
वन्दे नवघनश्यामं पीतकौशेयवाससम्।
सानन्दं सुन्दरं शुद्धं श्रीकृष्णं प्रकृतेः परम्॥1॥
गोपानां नन्दनं गोपं गोपिका-नयनप्रियं।
गोकुलानन्दनं वन्दे गोपालं गो-समावृतम्॥2॥
मन्दारमाला-वलयं चारु-बर्ह-शिखण्डकम्।
गुञ्जावली-समायुक्तं वन्दे बालं घनप्रभम्॥3॥
कुन्द-मन्दार-पुष्पैश्च तुलस्या परिवेष्टितम्।
मुरली-वादन-तत्परं वन्दे गोपाल-बालकम्॥4॥
श्रीवत्सवक्षसं शान्तं दिव्याभरणभूषितम्।
नवनीत-प्रियं नित्यं नवनीताशनं भजे॥5॥
यशोदा-नन्दनं कृष्णं यशोदा-प्राणवल्लभम्।
यशोदा-लालितं वन्दे यशोदा-बाल-लालसम्॥6॥
गोपी-जन-मनो-हारी राधा-हृदय-वल्लभम्।
रास-मण्डल-मध्यस्थं वन्दे रास-रस-प्रियम्॥7॥
करारविन्देन पादारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥8॥
॥ इति श्री गोपाल स्तुतिः सम्पूर्णा ॥










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